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________________ ३२ पद्मपुराणे प्रशान्तेन शरीरेण भुवनं शमयन्निव । पतिर्गणस्य साधूनां गौतमाख्योऽवतिष्ठते ॥१३॥ दूरादेवावतीर्णश्च करेणोश्चरणायनः । प्रमोदोत्फुल्लनयनो डुढौके विनयानतः ||१४|| ततस्तं त्रिपत्यासौ प्रणम्य च कृताञ्जलिः । दत्ताशीर्गणनाथेन धरायां समुपाविशत् ||१५|| अथ दन्तप्रभाजालधवलीकृतभूतलः । पर्यपृच्छदिदं राजा कुशलप्रश्नपूर्वकम् ॥१६॥ भगवन् पद्मचरितं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । उत्पादितान्यथैवास्मिन् प्रसिद्धिः कुमतानुगैः ॥१७॥ राक्षस हि सँ लङ्केशो विद्यावान् मानवऽपि वा । तिर्यग्मिः परिभूतोऽसौ कथं क्षुद्रकवानरैः ॥ १८ ॥ अर्त्ति चात्यन्तदुर्गन्धं कथं मानुषविग्रहम् । कथं वा रामदेवेन वालिश्छिद्रेण नाशितः ||१९|| गत्वा वा देवनिलयं मत्वोपवनमुत्तमम् । वन्दीगृहं कथं नीतो रावणेनामराधिपः ॥ २० ॥ सर्वशास्त्रार्थकुशलो रोगवर्जितविग्रहः । शेते च स कथं मासान् षडेतस्य वरोऽनुजः ||२१|| कथं चात्यन्तगुरुमिः पर्वतैरलमुन्नतः । सेतुः शाखामृगैर्बद्धो यः सुरैरपि दुर्घटः || २२॥ प्रसीद मगवन्नेतत्सर्वं कथयितुं मम । उत्तारयन् बहून् मन्यान् संशयोदारकर्दमात् ॥२३॥ एवमुक्तो गणेशः स निर्गतैर्देशनांशुभिः । क्षालयन्निव निःशेषं कुसुमैर्मलिनं जगत् ॥२४॥ लतामवनमध्यस्थान्नर्तयन्नुरगद्विषः । गम्भीराम्मोदनिर्घोषधीरयोदाहरद् गिरा ||२५|| शृण्वायुष्मन् महीपाल देवानांप्रिय यत्नतः । मम वाक्यं जिनेन्द्रोक्तं तत्वशंसनतत्परम् ॥२६॥ रावणो राक्षसो नैव न चापि मनुजाशनः । अलीकमेव तत्सर्वं यद्वदन्ति कुवादिनः ||२७|| समान लाल-लाल थे, उनके नेत्र कमलोंके समान थे, अपने शान्त शरीरसे संसारको शान्त कर रहे थे, और मुनियोंके अधिपति थे ||९ - १३॥ राजा श्रेणिक दूरसे ही हस्तिनीसे नीचे उतरकर पैदल चलने लगे, उनके नेत्र हर्षसे फूल गये, और उनका शरीर विनयसे झुक गया । वहाँ जाकर उन्होंने तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, हाथ जोड़कर प्रणाम किया और फिर गणधर स्वामीका आशीर्वाद प्राप्त कर वे पृथ्वीपर ही बैठ गये ।१४-१५ ॥ तदनन्तर— दाँतोंकी प्रभासे पृथ्वी - तलको सफेद करते हुए राजा श्रेणिकने कुशल- प्रश्न पूछने के बाद गणधर महाराजसे यह पूछा || १६ | | उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! मैं रामचन्द्रजीका वास्तविक चरित्र सुनना चाहता हूँ क्योंकि कुधर्मके अनुगामी लोगोंने उनके विषयमें अन्य प्रकारकी ही प्रसिद्धि उत्पन्न कर दी है ||१७|| लंकाका स्वामी रावण, राक्षस वंशी विद्याधर मनुष्य होकर भी तिर्यंचगतिके क्षुद्र वानरोंके द्वारा किस प्रकार पराजित हुआ || १८॥ वह, अत्यन्त दुर्गन्धित मनुष्य शरीरका भक्षण कैसे करता होगा ? रामचन्द्रजीने कपटसे बालिको कैसे मारा होगा ? देवोंके नगर में जाकर तथा उसके उत्तम उपवनको नष्ट कर रावण इन्द्रको बन्दीगृह में किस प्रकार लाया होगा ? उसका छोटा भाई कुम्भकर्णं तो समस्त शास्त्रोंके अर्थं जाननेमें कुशल था तथा नीरोग शरीरका धारक था फिर छह माह तक किस प्रकार सोता रहता होगा ? जो देवोंके द्वारा भी अशक्य था ऐसा बहुत ऊँचा पुल भारी-भारी पर्वतोंके द्वारा वानरोंने कैसे बनाया होगा ? ॥१९ - २२ ॥ हे भगवन् ! मेरे लिए यह सब कहने के अर्थ प्रसन्न हूजिए और संशयरूपी भारी कीचड़से अनेक भव्य जीवोंका उद्धार कीजिए ||२३|| इस प्रकार राजा श्रेणिकके पूछनेपर गौतम गणधर अपने दाँतोंकी किरणोंसे समस्त मलिन संसारको धोकर फूलोंसे सजाते हुए और मेघ गर्जनाके समान गम्भीर वाणीके द्वारा लतागृहों के मध्य में स्थित मयूरोंको नृत्य कराते हुए कहने लगे || २४ - २५ ॥ कि हे आयुष्मन् ! हे देवोंके प्रिय ! भूपाल ! तू यत्नपूर्वक मेरे वचन सुन । मेरे वचन जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा उपदिष्ट हैं, तथा पदार्थका सत्यस्वरूप प्रकट करनेमें तत्पर हैं ||२६|| रावण राक्षस नहीं था और न १. चरिते ख. । २. राक्षसोऽपि हि म. । म. । ६. उत्तरय-म. । ७. गणेशस्य म । Jain Education International ३. सुलङ्केशी क. । ४. अति चात्यन्तं म । ५० भक्त्वा पवन ८. निर्घोषं म. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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