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________________ द्वितीयं पर्व 'संतापमपरिप्राप्तैः कृतमीश्वरमार्गणैः । मनुजैर्यत्करोतीव त्रिपुरस्य जिगीषुताम् ॥ ३६ ॥ सुधारससमासंगपाण्डुरागारपङ्क्तिभिः । टङ्ककल्पितशीतांशुशीलाभिरिव कल्पितम् ||३७|| मदिरात्तव निताभूषणस्वनसंभृतम् । कुबेरनगरस्येव द्वितीयं संनिवेशनम् ||३८|| तपोवनं मुनिश्रेष्ठेश्याभिः काममन्दिरम् । लासकैर्नृ त्तभवनं शत्रुभिर्यमपत्तनम् ||३९|| शस्त्रिभिर्वीरनिलयोऽभिलाषमणिरर्थिमिः । विद्यार्थिभिर्गुरोः सद्म वन्दिभिधूर्तपत्तनम् ॥ ४० ॥ गन्धर्वनगरं गीतशास्त्रकौशल कोविदैः । विज्ञानग्रहणोद्युक्तैर्मन्दिरं विश्वकर्मणः ॥ ४१ ॥ साधूनां संगमः सद्भिर्भूभिर्लाभस्य वाणिजैः । पञ्जरं शरणप्राप्तैर्वज्रदारुविनिर्मितम् ॥४२॥ वार्तिकेरसुरच्छिद्रं विदग्धैर्विटमण्डली । परिणामो मनोज्ञस्य कर्मणो मार्गवर्तिभिः ॥ ४३ ॥ चौरणैरुत्सवावासः कामुकैरप्सरः पुरम् | सिद्धलोकश्च विदितं यत्सदा सुखिभिर्जनैः ॥ ४४ ॥ यत्र मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च योषितः । श्यामाश्च पद्मरागिण्यो गौर्यश्च विभवाश्रयाः ॥ ४५ ॥ चन्द्रकान्तशरीराश्च शिरीष सुकुमारिकाः । भुजङ्गानामगम्याश्च कञ्चुकानृतविग्रहाः ॥ ४६ ॥ द्वारा चमर कम्पित होते रहते हैं || ३५ || वह नगर, मानो त्रिपुर नगरको जीतना ही चाहता है क्योंकि जिस प्रकार त्रिपुर नगरके निवासी मनुष्य ईश्वरमार्गणैः अर्थात् महादेवके बाणोंके द्वारा किये हुए सन्तापको प्राप्त हैं उस प्रकार उस नगरके मनुष्य ईश्वरमार्गणैः अर्थात् धनिकवर्गकी याचनासे प्राप्त सन्तापको प्राप्त नहीं थे - सभी सुखसे सम्पन्न हैं || ३६ || वह नगर चूनासे पुते सफेद महलोंकी पंक्तिसे लसा जान पड़ता है मानो टाँकियोंसे गढ़े चन्द्रकान्त मणियोंसे ही बनाया गया हो ॥ ३७ ॥ वह नगर मदिरा के नशा में मस्त स्त्रियोंके आभूषणोंकी झनकारसे सदा भरा रहता है इसलिए ऐसा जान पड़ता है मानो कुबेरकी नगरी अर्थात् अलकापुरीका द्वितीय प्रतिबिम्ब ही हो ||३८|| उस नगरको श्रेष्ठ मुनियोंने तपोवन समझा था, वेश्याओंने कामका मन्दिर माना था, नृत्यकारोंने नृत्यभवन समझा था और शत्रुओंने यमराजका नगर माना था ॥ ३९ ॥ शस्त्रधारियोंने वीरोंका घर समझा था, याचकोंने चिन्तामणि, विद्यार्थियोंने गुरुका भवन और वन्दीजनों धूर्तों का नगर माना था ||४०|| संगीत शास्त्र के पारगामी विद्वानोंने उस नगरको गन्धर्वका नगर और विज्ञान के ग्रहण करने में तत्पर मनुष्योंने विश्वकर्माका भवन समझा था ॥ ४१ ॥ सज्जनोंने सत्समागमका स्थान माना था, व्यापारियोंने लाभकी भूमि और शरणागत मनुष्योंने वज्रमय लकड़ीसे निर्मित- सुरक्षित पंजर समझा था || ४२ || समाचार प्रेषक उसे असुरोंके बिलजैसा रहस्यपूर्ण स्थान मानते थे, चतुर जन उसे विटमण्डली - विटोंका जमघट समझते थे, और समीचीन मार्गमें चलनेवाले मनुष्य उसे किसी मनोज्ञ - उत्कृष्ट कर्मका सुफल मानते थे ॥ ४३ ॥ चारण लोग उसे उत्सवोंका निवास, कामीजन अप्सराओंका नगर और सुखीजन सिद्धों का लोक मानते थे ॥ ४४ ॥ उस नगरकी स्त्रियाँ यद्यपि मातंगगामिनी थीं अर्थात् चाण्डालोंके साथ गमन करनेवाली थीं फिर भी शीलवती कहलाती थीं ( पक्षमें हाथियोंके समान सुन्दर चालवाली थीं तथा शीलवती अर्थात् पातिव्रत्य धर्मसे सुशोभित थीं । ) श्यामा अर्थात् श्यामवर्णवाली होकर भी पद्मरागिण्यः अर्थात् पद्मराग मणि-जैसी लाल क्रान्तिसे सम्पन्न थीं ( पक्षमें श्यामा अर्थात् नवयौवन से युक्त होकर पद्मरागिण्यः अर्थात् कमलोंमें अनुराग रखनेवाली थीं अथवा पद्मराग मोंसे युक्त थीं ) । साथ ही गौरी अर्थात् पार्वती होकर भी विभवाश्रया अर्थात् महादेवके आश्रयसे रहित थीं ( पक्षमें गौर्य: अर्थात् गौर वर्ण होकर विभवाश्रयाः अर्थात् सम्पदाओंसे सम्पन्न थीं ) ॥ ४५ ॥ उन स्त्रियोंके शरीर चन्द्रकान्त मणियोंसे निर्मित थे फिर भी वे शिरीषके समान १. संतापमपरैः म । २. चरण-ख । ३. सर्वलोकश्च म । Jain Education International १३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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