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________________ पपपुराणे संस्कारो द्विविधः प्रोक्तो लक्षणोद्देशतस्तथा । विन्यासस्तु सखण्डाः स्युः पदवाक्यास्तदुत्तराः ॥३०॥ सापेक्षा निरपेक्षा च काकुमेंदद्वयान्विता । गद्यः पद्यश्च मिश्रश्च समुदायस्त्रिधोदितः ॥३१॥ संक्षिप्तता विरामस्तु सामान्याभिहितः पुनः । शब्दानामेकवाच्यानां प्रयोगः परिकीर्तितः ॥३२॥ तुल्यार्थतैकशब्देन बह्वर्थप्रतिपादनम् । भाषार्यलक्षणम्लेच्छनियमास्त्रिविधा स्मृता ॥३३॥ पद्यव्यवहृतिलेख एवमाधास्तु जातयः । व्यक्तवाग्लोकवाग्मार्गव्यवहारश्च मातरः ॥३॥ एतेषामपि भेदानां ये भेदा बुधगोचराः । सर्वैरेमिः समायुक्तं सात्यवैदुक्तिकौशलम् ॥३५॥ शुष्कचित्रं द्विधा प्रोक्तं नानाशुष्कं च वर्जितम् । आईचित्रं पुनर्नाना चन्दनादिद्रवोद्भवम् ॥३६॥ कृत्रिमाकृत्रिमैरङ्गैर्भूजलाम्बरगोचरम् । वर्णकश्लेषसंयुक्तं सा विवेदाखिलं शुमा ॥३७॥ पुस्तकर्म विधा प्रोक्तं क्षयोपचयसंक्रमैः । तक्षणादिक्रमोद्भुतं काष्टादौ क्षयजं स्मृतम् ॥३८॥ उपचित्या मृदादीनामुपचेयं तु कथ्यते । संक्रान्तं तु यदाहस्य प्रतिबिम्ब विभाव्यते ॥३९॥ यन्त्रनिर्यन्त्रसच्छिद्रनिश्छिद्रादिभिरन्वितम् । सा जज्ञे तद्यथा मद्रा लोकेभ्यो दुर्लभस्तथा ॥४०॥ वुष्किम छिन्नमछिन्नं पत्रच्छेद्यं विधोदितम् । सूचीदन्तादिभिस्तत्र निर्मितं वुष्किम स्मृतम् ॥४१॥ उरस्थल, कण्ठ और मू के भेदसे स्थान तीन प्रकारका माना गया है। स्वरके षड्ज आदि सात भेद पहले कह ही आये हैं ॥२९॥ लक्षण और उद्देश अथवा लक्षणा और अभिधाकी अपेक्षा संस्कार दो प्रकारका कहा गया है। पदवाक्य, महावाक्य आदिके विभागसहित जो कथन है वह विन्यास कहलाता है ॥३०॥ सापेक्षा और निरपेक्षाकी अपेक्षा काकु दो भेदोंसे सहित है। गद्य, पद्य और मिश्र अर्थात् चम्पूकी अपेक्षा समुदाय तीन प्रकारका कहा गया है ॥३१॥ किसी विषयका संक्षेपसे उल्लेख करना विराम कहलाता है। एकार्थक अर्थात् पर्यायवाची शब्दोंका प्रयोग करना सामान्याभिहित कहा गया है ।।३२।। एक शब्दके द्वारा बहुत अर्थका प्रतिपादन करना समानार्थता है। आर्य, लक्षण और म्लेच्छके नियमसे भाषा तीन प्रकारकी कही गयी है ॥३३॥ इनके सिवाय जिसका पद्यरूप व्यवहार होता है उसे लेख कहते हैं। ये सब जातियां कहलाती हैं। व्यक्तवाक्, लोकवाक् और मार्गव्यवहार ये मातृकाएँ कहलाती हैं। इन सब भेदोंके भी अनेक भेद हैं जिन्हें विद्वज्जन जानते हैं। इन सबसे सहित जो भाषण-चातुर्य है उसे उक्तिकौशल कहते हैं। केकया इस उक्ति-कौशलको अच्छी तरह जानती थी ॥३४-३५॥ नानाशुष्क और वर्जितके भेदसे शुष्कचित्र दो प्रकारका कहा गया है तथा चन्दनादिके द्रवसे उत्पन्न होनेवाला आर्द्रचित्र अनेक प्रकारका है ॥३६॥ कृत्रिम और अकृत्रिम रंगोंके द्वारा पृथ्वी, जल तथा वस्त्र आदिके ऊपर इसको रचना होती है। यह अनेक रंगोंके सम्बन्धसे संयुक्त होता है। शुभ लक्षणोंवाली केकया इस समस्त चित्रकलाको जानती थी ॥३७।। क्षय, उपचय और संक्रमके भेदसे पुस्तकर्म तीन प्रकारका कहा गया है। लकड़ी आदिको छील-छालकर जो खिलौना आदि बनाये जाते हैं उसे क्षयजन्य पुस्तकर्म कहते हैं। ऊपरसे मिट्टी आदि लगाकर जो खिलौना आदि बनाये जाते हैं उसे उपचयजन्य पुस्तकर्म कहते हैं तथा जो प्रतिबिम्ब अर्थात् सांचे आदि गढ़ाकर बनाये जाते हैं उसे संक्रमजन्य पुस्तकम कहते हैं ।।३८-३९।। यह पुस्तकर्म, यन्त्र, निर्यन्त्र, सच्छिद्र तथा निश्छिद्र आदिके भेदोंसे सहित है, अर्थात् कोई खिलौना यन्त्रचालित होते हैं, और कोई बिना यन्त्रके होते हैं, कोई छिद्रसहित होते हैं, कोई छिद्ररहित। वह केकया पुस्तकर्मको ऐसा जानती थी जैसा दूसरोंके लिए दुर्लभ था ॥४०॥ पत्रच्छेदके तीन भेद हैं-बुष्किम, छिन्न और अच्छिन्न । सुई अथवा दन्त आदिके द्वारा जो बनाया जाता है उसे बुष्किम कहते हैं। जो कैंचीसे काटकर बनाया जाता है तथा जो अन्य अवयवोंके सम्बन्धसे युक्त होता है उसे १. भाषापलक्षण- म । २. बुद्धयगोचराः म.। ३. वर्णक: श्लेष्म- म. । ४. क्षयसंस्मृतम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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