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________________ ४५६ पद्मपुराणे उपेन्द्रवज्रावृत्तम् पुनस्तदुवृत्त्य जगाद राजन् यथामुना रत्नवरेण हीनः । न शोभतेऽङ्गारकलाप एष त्वया विनेदं भुवनं तथैव ।।१५४।। उपजातिवृत्तम नाथ त्वयेमा विकला विनाथा प्रजा विनश्यन्त्यखिला वराक्यः । प्रजासु नष्टासु तथैव धर्मो धर्म विनष्टे वद किं न नष्टम् ॥१५५।। तस्माद्यथा ते जनकः प्रजाभ्यो दत्वा भवन्तं परिपालनाय । तपोऽकरोनिवृतिदानदक्ष तथा भवान् रक्षतु गोत्रधर्मम् ।।१५६॥ अथैवमुक्तः कुशलैरमात्यैरवग्रहं कीर्तिधरश्चकार । श्रुत्वा प्रजातं तनयं प्रपत्स्ये ध्रुवं मुनीनां पदमत्युदारम् ॥१५७॥ ततः स शक्रोपममोगवीर्यः स्फीतां व्यवस्थामहतीं धरित्रीम् । सुखं शशासाखिलमीतिमुक्तां स मूरिकालं सुसमाहितात्मा ॥१५॥ उपेन्द्रवज्रावृत्तम् चिरं ततः कीर्तिधरेण साकं सुखं मजन्ती सहदेवदेवी। क्रमेण संपूर्णगुणं प्रसूता सुतं धरित्रीधरणे समर्थम् ॥१५९।। उपजातिवृत्तम् समुत्सवस्तत्र कृतो न जाते मागाद्धरित्रीपतिकर्णजाहम् । वातति कांश्चिदिवसान्निगढः कालः कथंचियसवस्य जातः ॥१६॥ वह रत्न उठाकर बोले कि हे राजन् ! जिस प्रकार इस उत्तम रत्नसे रहित अंगारोंका समूह शोभित नहीं होता है उसी प्रकार आपके बिना यह संसार शोभित नहीं होगा ॥१५४|| हे नाथ ! तुम्हारे बिना यह बेचारी समस्त प्रजा अनाथ तथा विकल होकर नष्ट हो जायेगी। प्रजाके नष्ट होनेपर धर्म नष्ट हो जायेगा और धर्मके नष्ट होनेपर क्या नहीं नष्ट होगा सो तुम्हीं कहो ॥१५५॥ इसलिए जिस प्रकार आपके पिताने प्रजाकी रक्षाके लिए आपको देकर मोक्ष प्रदान करनेमें दक्ष तपश्चरण किया था उसी प्रकार आप भी अपने इस कुलधर्मकी रक्षा कीजिए ॥१५६॥ अथानन्तर कुशल मन्त्रियोंके इस प्रकार कहने पर राजा कीर्तिधरने नियम किया कि जिस समय मैं पुत्रको उत्पन्न हुआ सुनूँगा उस समय मुनियोंका उत्कृष्ट पद अवश्य धारण कर लँगा ||१५७॥ तदनन्तर जिसके भोग और पराक्रम इन्द्रके समान थे तथा जिसकी आत्मा सदा सावधान रहती थी ऐसे राजा कीर्तिधरने सब प्रकारके भयसे रहित तथा व्यवस्थासे युक्त दीर्घ पृथ्वीका चिरकाल तक पालन किया ॥१५८|| तदनन्तर राजा कीर्तिधरके साथ चिरकाल तक सुखका उपभोग करती हुई रानी सहदेवीने सवंगुणोंसे परिपूर्ण एवं पृथ्वीके धारण करने में समर्थ पुत्रको उत्पन्न किया ॥१५९|| पुत्र-जन्मका समाचार राजाके कानों तक न पहुँच जावे इस भयसे पुत्र जन्मका उत्सव नहीं किया गया तथा इसी कारण कितने ही दिन तक प्रसवका १. दानदत्तं म.। २. प्रतिज्ञां म.। ३. प्रपश्ये म., ज., ख.। ४. पदमप्युदारं म.। पदमप्युदारः ज. । पदमप्युदाराः ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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