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________________ ४२९ विशतितमं पर्व कोटीकोव्यो दशैतेषां कालो 'रत्नाकरोपमः । सागरोपमकोटीनां दशकोट्योऽवसर्पिणी ॥७७॥ उत्सर्पिणीच तावन्त्यस्ते सितासितपक्षवत् । सततं परिवर्तेते राजन् कालस्वभावतः॥७८॥ प्रत्येकमेतयोमंदाः षडदिष्टा महात्मभिः। संसगिवस्तुवीयोदिभेदसंमववृत्तयः ॥७९॥ अत्यन्तः सुषमः कालः प्रथमः परिकीर्तितः । कोटी कोव्यश्चतस्रोऽस्य सामुदोन्मानमुच्यते ॥८॥ कीर्तितः सुषमस्तिस्रो द्वयं सुषमदुःषमः। वक्ष्यमाणद्विकालोऽब्दैरूना दुःषमसत्तमः॥८१॥ उक्को वर्षसहस्राणामेकविंशतिमानतः । प्रत्येकं दुःषमोऽत्यन्तदुःषमश्च जिनाधिपैः ॥१२॥ पञ्चाशदधिकोटोना लक्षाः प्रथममुच्यते । त्रिंशद्दशनवैतासां परिपाट्या जिनान्तरम् ॥८॥ नवतिश्च सहस्राणि नव चासा व्यवस्थितः । शतानि च नवंतासां नवतिस्तास्तथा नव ॥८४॥ शैतवाचिखखद्योषड्विषट्षड्वर्षविच्युता। एका कोटी समुद्राणां ज्ञेयं दशममन्तरम् ॥८५॥ चतुर्भिः सहिता ज्ञेयाः पञ्चाशत्सागरास्ततः । त्रिंशन्नवाथ चत्वारः सागराः कीर्तितास्ततः ॥८६॥ पल्यमागत्रयन्यूनं तयो रत्नाकरत्रयम् । पल्याध षोडश प्रोक्तं चतुर्भागोऽस्य तत्परम् ॥४७॥ न्यूनः कोटिसहस्रेण वर्षाणां परिकीर्तितः । समाकोटिसहस्रं च तत्परं गदितं बुधैः ॥८८॥ सौ-सौ वर्षके बाद एक-एक रोमखण्ड निकाला जाय जितने समयमें खाली हो जाय उतना समय एक पल्य कहलाता है। दश कोड़ाकोड़ी पल्योंका एक सागर होता है और दश कोड़ा-कोड़ी सागरोंकी एक अवसर्पिणी होती है ।।७६-७७|| उतने ही समयकी एक उत्सर्पिणी भी होती है। हे राजन् ! जिस प्रकार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष निरन्तर बदलते रहते हैं उसी प्रकार काल-द्रव्यके स्वभावसे अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल निरन्तर बदलते रहते हैं ॥७८॥ महात्माओंने इन दोनोंमें से प्रत्येकके छह-छह भेद बतलाये हैं। संसर्ग में आनेवाली वस्तुओंके वीर्य आदिमें भेद होनेसे इन छह-छह भेदोंकी विशेषता सिद्ध होती है ॥७९॥ अवसर्पिणीका पहला भेद सुषमा-सुषमा काल कहलाता है। इसका चार कोड़ा-कोड़ो सागर प्रमाण काल कहा जाता है ।।८०॥ दूसरा भेद सुषमा कहलाता है। इसका प्रमाण तीन कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण है। तीसरा भेद सुषमा-दुःषमा कहा जाता है। इसका प्रमाण दो कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण है। चौथा भेद दुःषमा-सुषमा कहलाता है। इसका प्रमाण बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ी-कोड़ी सागर प्रमाण है। पांचवां भेद दुःषमा और छठा भेद दुःषमा-दुःषमा काल कहलाता है इनका प्रत्येकका प्रमाण इक्कीस-इक्कीस हजार वर्षका जिनेन्द्र देवने कहा है ।।८१-८२॥ अब तीर्थंकरोंका अन्तर काल कहते हैं । भगवान ऋषभदेवके बाद पचास लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर द्वितीय अजितनाथ तीर्थंकर हुए। उसके बाद तीस लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर तृतीय सम्भवनाथ उत्पन्न हुए। उनके बाद दश लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर चतुर्थ अभिनन्दननाथ उत्पन्न हुए ॥८३।। उनके बाद नौ लाख करोड़ सागरके बीतनेपर पंचम सुमतिनाथ हए, उनके बाद नब्बे हजार करोड़ सागर बीतनेपर छठे पद्मप्रभ हुए, उनके बाद नौ हजार करोड़ सागर बीतनेपर सातवें सुपार्श्वनाथ हुए, उनके बाद नौ सौ करोड़ सागर बीतनेपर आठवें चन्द्रप्रभ हुए, उनके बाद नब्बे करोड़ सागर बीतनेपर नवें पुष्पदन्त हुए, उनके बाद नौ करोड़ सागर बीतनेपर दशवें शीतलनाथ हुए, उनके बाद सौ सागर कम एक करोड़ सागर बीतनेपर ग्यारहवें श्रेयांसनाथ हुए, उनके बाद चौवन सागर बीतनेपर बारहवें वासुपूज्य स्वामी हुए, उनके बाद तीस सागर बीतने१. सागरोपमः । २. संसपि- ख. । ३. म. पुस्तके ८५ तमश्लोकस्थाने 'समुद्रशतहीनका कोटीदशममन्तरम् । चतुभिः सहिता ज्ञेयः पश्चाशत्सागरास्ततः' इति पाठोऽस्ति । ४. ब. पुस्तके ८६ तमः श्लोकः षद्भिः पादैरत्र समाप्यते । ५. क. पुस्तके ८७ तमः श्लोकः षडभिः पादैरत्र समाप्यते । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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