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________________ एकोनविंशतितमं पर्व ४१३ गुणेषु भाष्यमाणेषु श्रीशैलो नतविग्रहः । सबीड इव संवृत्तः प्रायो वृत्तिरियं सताम् ॥२९॥ भविष्यतोऽथ संग्रामाद्भयेनेव दिवाकरः । अस्तं सेवितुमारेभे मन्दारुणकरोत्करः ॥३०॥ संध्यास्य पृष्ठतो यान्ती वहन्ती रागमुस्कटम् । शुशुभे प्राणनाथस्य विनीता रमणो यथा ॥३१॥ ततो निशावधू रेजे कृतचन्द्रविशेषका । कुर्वाणानुगतिं भर्तुर्वासरस्य निरन्तरम् ॥३२॥ अन्येद्युर्मानुभिर्भानोरुज्ज्वले भुवने कृते । दशग्रीवः सुसन्नद्धः समस्तबलमध्यगः ॥२३॥ आसन्नस्थहनूमत्कः कृतमङ्गलविग्रहः । विद्यया जलधिं मित्त्वा प्रयातो वारुणं पुरम् ॥३४॥ प्रत्यरिं बजतोऽमुष्य दीप्तिरासीदनुत्तमा । कुठारराममुद्दिश्य सुभूमस्येव चक्रिणः ॥३५॥ ज्ञात्वा दशाननं प्राप्तं सैन्यनिस्वनसूचितम् । संचुलोम पुरं सर्व वरुणस्य महारवम् ॥३६॥ पातालपुण्डरीकाख्यं तत्पुरं प्रबलध्वजम् । सुरत्तोरणं जातं सन्नाहरवसंकुलम् ॥३७॥ तत्रासुरपुराकारे पुरे सर्वमनोहरे । आसीच्चकितनेत्राणां स्त्रीणामाकुलता परा ॥३८॥ योधास्तत्र निराक्रामन् समा भवनवासिनाम् । चमरासुरतुल्यश्च वरुणः शौर्यगर्वितः ॥३९॥ तस्य पुत्रशतं तावदुत्थितं यो मुद्धतम् । नाना प्रहरणवातरुद्धभास्करदर्शनम् ॥४०॥ आपातमात्रकेणव भग्नं तै राक्षसं बलम् । असुराणामिवोदारैः कुमारैः क्षौददैवतम् ॥४१॥ बलवान् तथा तेजोमण्डलके धारक वीरको पाकर मुझे इस संसारमें कोई भी कार्य कठिन नहीं रह जायेगा ॥२८|| जब रावण हनूमान्के गुणोंका वर्णन कर रहा था तब वह लज्जितके समान नम्र शरीरका धारक हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंको यही वृत्ति है ।।२९॥ तदनन्तर जिसकी किरणोंका समूह लाल पड़ गया था ऐसा सूर्य मानो होनेवाले संग्रामके भयसे ही अस्त हो गया था ।।३०।। उसके पीछे-पीछे जाती और उत्कट राग अर्थात् लालिमा ( पक्षमें प्रेम) को धारण करती हुई सन्ध्या ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो अपने प्राणनाथके पीछे-पीछे जाती हुई विनीत स्त्री-कुलवधू ही हो ॥३१॥ जो निरन्तर सूर्यके पीछे-पीछे चला करती थी ऐसी रात्रिरूपी वधू चन्द्रमारूपी तिलक धारण कर अतिशय सुशोभित होने लगी ॥३२।। दूसरे दिन जब सूर्यकी किरणोंसे संसार प्रकाशमान हो गया तब रावण तैयार होकर वरुणके नगरकी ओर चला। उस समय रावण अपनी समस्त सेनाके मध्य में चल रहा था। हनूमान् उसके पास ही स्थित और मंगलद्रव्य उसने शरीरपर धारण कर रखे थे। वह विद्याके द्वारा समुद्रको भेदन कर वरुणके नगरकी ओर चला ॥३३-३४॥ जिस प्रकार परशुरामको लक्ष्य कर चलनेवाले सुभौम चक्रवर्तीको अनुपम दीप्ति थी उसी प्रकार शत्रुके सम्मुख जानेवाले रावणकी दीप्ति भी अनुपम थी ॥३५॥ सेनाको कल-कलसे दशाननको आया जान वरुणका समस्त नगर क्षुभित हो गया उसमें बड़ा कुहराम मच गया ॥३६॥ वरुणका वह नगर पातालपुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध था। उसमें मजबूत ध्वजाएं लगी हुई थीं और रत्नमयी तोरण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे, पर रावणके पहुंचनेपर सारा नगर युद्धकी तैयारी सम्बन्धी कल-कलसे व्याप्त हो गया ॥३७॥ असुरोंके नगरके समान सबके मनको हरनेवाले उस नगरमें खासकर स्त्रियोंमें बड़ी आकुलता उत्पन्न हो रही थी। भयसे उनके नेत्र त्रकित हो गये थे ॥३८॥ वहां भवनवासी देवोंके समान जो योद्धा थे वे बाहर निकल आये तथा चमरेन्द्रके समान पराक्रमसे गर्वीला वरुण भी निकलकर बाहर आया ॥३९॥ जिन्होंने नाना प्रकारके शत्रोंके समूहसे सूर्यका दिखना रोक दिया था ऐसे वरुणके सौ पराक्रमी पुत्र भी युद्ध करनेके लिए उठ खड़े हुए ॥४०॥ सो जिस प्रकार असुरकुमार अन्य क्षुद्र देवताओंको क्षण एकमें पराजित कर देते हैं उसी प्रकार वरुणके सौ पुत्रोंने क्षण एकमें ही राक्षसोंकी सेनाको परा१. वरुणं म. । २. प्रत्यरि म., ज., क., ख.। ३. परशुरामम् । ४. प्राप्य म.। ५. -पोण्डरीकाख्यं म.। ६. महाभवन ख., ज. । ७. क्षुद्रदैवतम् म., ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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