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________________ सप्तदर्श पर्व स्वनान्येकोनपञ्चाशत्संजेगौ परिनिष्टितम् । जिनेन्द्र गुणसंबद्धे वंचनैर्ललिताक्षरैः ॥ २८० ॥ विद्युन्मालावृत्तम् `देवादेवैर्भक्तिप्रह्वैः पुष्पैरघैर्नानागन्धैः । अर्चामुच्चैनीतं वन्यं देवं भक्त्या स्वामर्हन्तम् ॥ २८१ ॥ आर्यागीतिच्छन्दः त्रिभुवनकुशलमतिशय पूतं [ नित्यं ] नमामि भक्त्या परया । मुनिसुव्रतचरणयुगं सुरपति मुकुटप्रवृत्तन खमणिकिरणम् ॥ २८२ ॥ अनुष्टुप् ततो वसन्तमाला तद्गेयमत्यन्तशोभनम् । प्रशशंसाश्रुतपूर्वं विस्मयव्याप्तमानसा ॥२८३॥ अहो गीतमहो गीतं केनाप्येतन्मनोहरम् । आर्द्राकृतमिवानेन हृदयं मे सुधामुचा ॥ २८४ ॥ स्वामिनीं च जगादैवं देवि कोऽप्यनुकम्पकः । देवोऽयं येन नौ रक्षा कृता केसरिनोदनात् ॥ २८५॥ मन्येऽस्मद्वृत्तयेऽनेन गोतमेतच्छ्रतिप्रियम् । श्रुताबलाकलध्वानमन्तरे सकलाङ्गकम् ॥ २८६॥ देवि शीलवती कस्य नानुकम्प्यासि शोभने । महारण्येऽपि भव्यानां भवन्ति सुहृदो जनाः ॥२८७॥ उपसर्गस्य विध्वंसादेतस्मात्ते सुनिश्चितः । भविता प्रियसंपर्कः किं वा वक्त्यन्यथा मुनिः ॥ २८८ ॥ तस्मात्साधुमिमं देवं समाश्रित्य कृतोचितम् । मुनिपर्यङ्कपूतायां गुहायामत्र' संक्षयात् ॥ २८९ ॥ मुनिसुव्रतनाथस्य विन्यस्य प्रतियातनाम् । अर्चयन्त्यौ सुखप्राप्त्यै स्वामोदैः कुसुमैरलम् ॥ २९०॥ सुखप्रसूतिमेतस्य गर्भस्याध्यायचेतसि । विस्मृत्य वैरहं दुःखं समयं किंचिदास्वहै ॥२९१ ॥ ३९१ अथवा उनसे भी अधिक उत्तम गान गा रहा था और प्राय:कर गन्धर्व देवोंमें यही गान प्रसिद्धको प्राप्त है ||२७९|| वह उनचास ध्वनियोंमें गा रहा था तथा उसका वह समस्त गान जिनेन्द्र भगवान् के गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाले मनोहर अक्षरोंसे युक्त वचनावलीसे निर्मित था ॥ २८० ॥ वह गा रहा था कि भक्ति नम्रीभूत सुर-असुर पुष्प, अर्घ तथा नाना प्रकारकी गन्धसे जिनकी उत्तम पूजा करते हैं ऐसे देवाधिदेव वन्दनीय अरहन्त भगवान्‌को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ||२८१ ॥ | उसने यह भी गाया कि मैं श्री मुनिसुव्रत भगवान् के उस चरण युगलको उत्कट भक्तिसे नमस्कार करता हूँ जो त्रिभुवनकी कुशल करनेवाला है, अत्यन्त पवित्र है और इन्द्रके मुकुटका सम्बन्ध पाकर जिसके नखरूपी मणियोंसे किरणें फूट पड़ती हैं ॥ २८२ ॥ तदनन्तर जिसका मन आश्चर्यं से व्याप्त था ऐसी वसन्तमालाने उस अश्रुतपूर्वं तथा अत्यन्त सुन्दर संगीतकी बहुत प्रशंसा की || २८३ || वह कहने लगी कि वाह ! वाह ! यह मनोहर गान किसने गाया है । इस अमृतवर्षी गवैयाने तो मेरा हृदय मानो गीला ही कर दिया है || २८४ ॥ उसने स्वामिनीसे कहा कि हे देवि ! यह कोई देव है जिसने सिंह भगाकर हम लोगोंकी रक्षा की है ।।२८५।। जिसके बीचमें स्त्रीका मधुर शब्द सुनाई देता था तथा जो संगीतके समस्त अंगों से सहित था ऐसा यह कर्णप्रिय गाना, जान पड़ता है इसने हम लोगों के लिए ही गाया है || २८६|| हे देवि ! हे शोभने ! उत्तम शीलको धारण करनेवाली ! तू किसकी दया- पात्र नहीं है ? भव्य जीवोंको महाअटवी में भी मित्र मिल जाते हैं || २८७ || इस उपसर्गके दूर होनेसे यह सुनिश्चित है कि तुम्हारा पति के साथ समागम होगा । अथवा क्या मुनि भी अन्यथा कहते हैं ? ||२८८ || इसलिए इस उत्तम देवका यथोचित आश्रय लेकर मुनिराजको पद्मासन से पवित्र इस गुफा में श्री मुनिसुव्रत भगवान्की प्रतिमा विराजमान कर सुख प्राप्ति के लिए अत्यन्त सुगन्धित फूलोंसे उसकी पूजा करती हुई हम दोनों कुछ समय तक यहीं रहें । इस गर्भंकी सुखसे प्रसूति हो जाये चित्तमें इसी बातका ध्यान रखें १. स जगौ म । २. सुरासुरैः । ३ च्छ्रुतप्रियम् म. । ४. कृत्वा कलकलध्वानमन्तरे म । श्रुत्वा बलाबब. । ५. -मघसंक्षयात् म. । ६. सुष्ठु आमोदो येषां तैः । स्वमोदैः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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