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________________ ३८८ पद्मपुराणे उत्पत्य त्वरिता व्योम्नि सख्यस्यास्तद्ग्रहाक्षमा । बभ्राम पक्षिणीवालं मण्डलेनाकुलात्मिका ॥२४॥ भूयः समीपमाकाशमेति प्रेमगुणाहृता । पुनश्च तीव्रवित्रासात् प्रयाति नभसः शिरः ॥२४१॥ अथ ते सभये दृष्ट्वा विशीर्णहृदये शुभे । गन्धर्वस्तद्गुहावासी कारुण्याश्लेषमीयिवान् ॥२४२॥ तमूचे मणिचूलाख्यं रत्नचूला निजाङ्गना । कारुण्येनोरुणा साध्वी चोदिता दुतभाषिणी ॥२४३॥ पश्य पश्य प्रिय ! वस्तां तां मृगेन्द्रादिह स्त्रियम् । एतत्प्रति समादिष्टां द्वितीयां च नमोऽङ्गणे ॥२४॥ कुरु नाथ प्रसादं मे रक्षतामतिविपलाम् । अभिजातां वरां नारी कुतोऽपि विषमश्रिताम् ॥२४५॥ एवमुक्तोऽथ गन्धर्वो विकृत्य शरभाकृतिम् । त्रैलोक्यमीषणद्रव्यसंभारेणेव निर्मिताम् ॥२४६॥ हस्तत्रितयमात्रस्थामञ्जनामसमागतम् । सिंह पुरोऽकरोद्देहच्छन्नसानुकदम्बकः ॥२४७॥ तयोस्तनाभवद्भीमः संघट्टो रवसंकुलः । विद्युदुद्योतितप्रावृधनसङ्घ हसन्निव ॥२४८॥ एवंविधेऽपि संप्राप्ते काले वीरभयावहे । अञ्जनासुन्दरी चक्रे हृदये जिनपुङ्गवान् ॥२४९॥ इत्थं वसन्तमाला च मण्डलेन कृतभ्रमा। विललाप महादुःखा कुरीव नभस्तले ॥२५०॥ हा भर्तृदारिके पूर्व दौर्भाग्यमसि संगता । तस्मिन्नपि गते कृच्छाद वर्जिता सर्वबन्धुभिः ॥२५॥ संप्राप्तासि वनं भीमं कथमप्यागतां गुहाम् । मुनिनाश्वासितासन्नप्रियावाप्तिनिवेदनात् ॥२५२॥ आलम्बनके साथ शरीर और आहारका त्याग कर दिया ॥२३९|| इसकी सखी वसन्तमाला इसे उठानेमें समर्थ नहीं थी इसलिए शीघ्रतासे आकाशमें उड़कर पक्षिणीकी तरह व्याकुल होती हुई मण्डलाकार भ्रमण कर रही थी-चक्कर लगा रही थी ॥२४०।। वह अंजनाके प्रेम और गुणोंसे आकर्षित होकर बार-बार उसके पास आती थी पर तीव्र भयके कारण पुनः आकाशमें ऊपर चली जाती थी ॥२४१।। अथानन्तर जिनके हृदय विशीर्ण हो रहे थे ऐसी उन दोनों स्त्रियोंको भयभीत देख उस गुफामें रहनेवाला गन्धर्व दयाके आलिंगनको प्राप्त हुआ अर्थात् उसे दया उत्पन्न हुई ।।२४२।। उस गन्धर्वकी स्त्रीका नाम रत्नचूला था। सो बहत भारी दयासे प्रेरित एवं शीघ्रतासे भाषण करनेवाली उस साध्वी नचूलान अपने पति मणिचूल नामा गन्धर्वसे कहा ॥२४३॥ कि हे प्रिय ! देखो देखो, सिंहसे भयभीत हुई एक स्त्री यहीं स्थित है और उससे सम्बन्ध रखनेवाली दूसरी स्त्री आकाशांगणमें चक्कर काट रही है ।।२४४॥ हे नाथ ! मेरे ऊपर प्रसाद करो और इस अत्यन्त विह्वल स्त्रीकी रक्षा करो। यह कुलवती उत्तम नारी किसी कारण इस विषम स्थान में आ पड़ी है ॥२४५। इस प्रकार कहनेपर गन्धवं देवने विक्रियासे अष्टापदका रूप बनाया। उसका वह रूप ऐसा जान पड़ता था मानो तीनों लोकोंमें जितने भयंकर पदार्थ हैं उन सबको इकट्ठा कर ही उसकी रचना की गयी हो ।।२४६|| अंजना और सिंहके बीचमें सिर्फ तीन हाथका अन्तर रह गया था कि इतने में ही अपने शरीरसे शिखरोंके समूहको आच्छादित करनेवाला अष्टापद सिंहके सामने आकर खड़ा हो गया ।।२४७|| तदनन्तर वहाँ सिंह और अष्टापदके बीच भयंकर युद्ध हुआ। उनका वह युद्ध भयंकर गर्जनासे युक्त था और बिजलीसे प्रकाशित वर्षाकालिक मेघोंके समूहकी मानो हँसी ही उड़ा रहा था ॥२४८|| इस प्रकार वहाँ शूरवीर मनुष्योंको भी भय उत्पन्न करनेवाला समय यद्यपि आया था तो भी अंजना निर्भय रहकर हृदयमें जिनेन्द्र देवका ध्यान करती रही ।।२४९॥ आकाशमें मण्डलाकार भ्रमण करती तथा महादुःखसे भरी वसन्तमाला कुररीकी तरह इस प्रकार विलाप कर रही थी ॥२५०।। हाय राजपुत्रि ! तुम पहले दौर्भाग्यको प्राप्त रही फिर जिस किसी तरह कष्टसे दौर्भाग्य समाप्त हुआ तो समस्त बन्धुजनोंने तुम्हारा त्याग कर दिया ।।२५१॥ भयंकर १. वालमण्डलेन म.। २. चोदिताद्भुतभाषिणी ब. । ३. एतद्भीतिसमा- म.। ४. आपद्गताम् । विषमाश्रिताम् म. । ५. विक्रियां कृत्वा । ६. -णैव निर्मितम् म.। ७. गताम् म.। ८. सिंहरिपुरकरोद्देहं म. । ९. कुटुम्बकम् क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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