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________________ पद्मपुराणे संग्रामे संशयो माभूत्प्रमादोऽस्येति निश्चयः । परित्यक्ता महायुद्धधिषणा कालवेदिना ॥६७॥ अतस्तत्प्रतिकाराय त्वयावश्यमिहागमः । कर्तव्यो नैव कर्तव्ये प्रस्खलन्ति मवादृशाः ॥६॥ अवधार्य त्वया साधं विधास्यामोऽत्र सांप्रतम् । मर्तापि तेजसां कृत्यं कुरुतेऽणसङ्गतः ॥६५॥ ततो लेखार्थमावेद्य वायवे निर्विलम्बितम् । गमने संमतिं चक्रे कृतमन्त्रः सुमन्त्रिमिः ॥७॥ अथ तं गमने सक्तं जानुस्पृष्टमहीतलः । वायुय॑ज्ञापयत्कृत्वा प्रणामं रचिताञ्जलिः ॥७१॥ नाथ ते गमनं युक्तं विद्यमाने कथं मयि । आलिङ्गनफलं कृत्यं जनकस्य सुतैननु ॥७२॥ ततो न जात एवास्मि यदि ते न करोमि तत् । गमनाज्ञाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे ततः ॥७३॥ ततः पिता जगादैनं कुमारोऽसि रणे भवान् । आगतो न क्वचित्खेदं तस्मादास्स्व जाम्यहम् ॥४॥ उन्नमय्य ततो वक्षः कनकाद्वितटोपमम् । पुनरोजोधरं वाक्यं जगाद पवनंजयः ॥७५॥ तात मे लक्षणं शक्तेस्त्वयैव जननं ननु । जगद्दाहे स्फुलिङ्गस्य किं वा वीर्य परीक्ष्यते ॥७६॥ भवच्छासनशेषातिपवित्रीकृतमस्तकः । भङ्गे पुरन्दरस्यापि समर्थोऽस्मि न संशयः ॥७॥ अभिधायेति कृत्वा च प्रणामं प्रमदी पुनः । उत्थायानुष्टितस्नानमोजनादिवपुःक्रियः ॥७८॥ सादरं कुलवृद्धाभिर्दत्ताशीः कृतमङ्गलः । प्रणम्य भावतः सिद्धान् दधानः परमां द्युतिम् ॥७९॥ 'युद्ध में इसका मरण न हो जाये' इस विचारसे समयकी विधिको जानते हुए मैंने महायुद्धकी भावना छोड़ दी है ॥६७|| इसलिए उसका प्रतिकार करने के लिए तुम्हें अवश्य ही यहाँ आना चाहिए क्योंकि आप-जैसे पुरुष करने योग्य कार्यमें कभी भूल नहीं करते ॥६८|| अब मैं तुम्हारे साथ सलाह कर ही आगेका कार्य करूंगा और यह उचित भी है क्योंकि सूर्य भी तो अरुणके साथ मिलकर ही कार्य करता है ।।६९|| अथानन्तर प्रह्लादने पवनंजयके लिए पत्रका सब सार बतलाकर तथा उत्तम मन्त्रियोंके साथ सलाहकर शीघ्र ही जानेका विचार किया ॥७०|| पिताको गमनमें उद्यत देख पवनंजयने पृथिवीपर घुटने टेककर तथा हाथ जोड़ प्रणाम कर निवेदन किया कि ॥७१।। हे नाथ! मेरे रहते हुए आपका जाना उचित नहीं है। पिता पुत्रोंका आलिंगन करते हैं सो पुत्रोंको उसका फल अवश्य ही चुकाना चाहिए ॥७२॥ यदि मैं वह फल नहीं चुकाता हूँ तो पुत्र ही नहीं कहला सकता अतः आप जानेकी आज्ञा देकर मुझपर प्रसन्नता कीजिए ।।७३।। इसके तरमें पिताने कहा कि अभी तुम बालक ही हो, युद्ध में जो खेद होता है उसे तुमने कहीं प्राप्त नहीं किया है इसलिए सुखसे यहीं बैठो में जाता है ||७४|| ___ तदनन्तर सुमेरुके तटके समान चौड़ा सीना तानकर पवनंजयने निम्नांकित ओजस्वी वचन कहे ॥७५॥ उसने कहा कि हे नाथ ! मेरी शक्तिका सबसे प्रथम लक्षण यही है कि मेरा जन्म आपसे हुआ है। अथवा संसारको भस्म करनेके लिए क्या कभी अग्निके तिलगेकी परीक्षा की जाती है ? ||७६|| आपको आज्ञारूपी शेषाक्षतसे जिसका मस्तक पवित्र हो रहा है ऐसा मैं इन्द्रको भी पराजित करनेमें समर्थ हूँ इसमें संशयकी बात नहीं है ।।७७॥ ऐसा कहकर उसने पिताको प्रणाम किया और फिर बड़ी प्रसन्नतासे उठकर उसने स्नान-भोजन आदि शारीरिक क्रियाएँ की ।।७८॥ तदनन्तर कुलकी वृद्धा स्त्रियोंने बड़े आदरसे आशीर्वाद देकर जिसका मंगलाचार किया था. जो उत्कृष्ट कान्तिको धारण कर रहा था और 'मंगलाचारमें बाधा न आ जाये : जिनके नेत्र आँसुओंसे आकुलित थे ऐसे आशीर्वाद देनेमें तत्पर माता-पिताने जिसका मस्तक १. संयमो ब. । मरणमित्यर्थः । २. परित्यक्तं महायुद्धं धिषणाकालवेदिना ब.। महायुद्धमित्यत्र 'मथा युद्ध'मित्यपि ब. पुस्तके पाठान्तरम् । ३. सूर्योऽपि । ४. कुरुते रणांगतः म. । ५. तेजःपूर्णम् । पुना राज्योद्धरं म.। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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