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________________ प्रस्तावना पद्मचरितके मुख्य कथा पात्र यद्यपि पद्मचरितके मुख्य नायक आठवें बलभद्र पद्म ( राम) है तथापि उनके सम्पर्कसे इसमें अनेक पात्रोंका सुन्दर चरित्र-चित्रण हुआ है जो मानवको मानवताकी प्राप्तिके लिए अत्यन्त सहायक हैं। इस स्तम्भमें मैं निम्नांकित १० पात्रोंका संक्षिप्त परिचय दे रहा है [१] रावण इन्द्र विद्याधरसे हारकर माली अलंकारपुर ( पाताल लंका ) में रहने लगता है । वहाँ उसके रत्नश्रवा नामका पुत्र होता है, तरुण होनेपर रत्नश्रवाका केकसीके साथ विवाह होता है। यही रत्नश्रवा और केकसीका युगल रावणके जन्मदाता हैं। रावण बाल्य अवस्थासे ही शूरवीर था। कुम्भकर्ण तथा विभीषण इसके अनुज थे और चन्द्रनखा इसकी लघु बहन थी। एक दिन केकसी की गोदमें रावण बैठा था उसी समय आकाशसे वैश्रवण विद्याधरकी सवारी निकलती है, उसके ठाट-बाटको देखकर रावण मासे पूछता है कि माँ! यह कौन प्रभावशाली पुरुष जा रहा है। माँ उसका परिचय देती हई कहती है कि यह तेरी मौसीका लड़का है, बड़ा प्रतापी है, इसने तेरे बाबाके भाईको मारकर लंका छीन ली है और हम लोगोंको इस पाताललंका में विपत्तिके दिन काटना पड़ रहा है। पिछले वैभवका दृश्य केकसीकी दृष्टि के सामने झूमने लगता है और वर्तमान दशाका चिन्तन करते-करते उसके नेत्रोंसे आँसू ढलकने लगते हैं। माताको दीन दशा देख रावण और कुम्भकर्ण उसे सान्त्वना देते हैं। रावण विद्याएं सिद्ध करनेके लिए सघन अटवीमें जाता है । जम्बू द्वीपका अनावृत यक्ष उसको कठिन परीक्षा लेता है । तरह-तरहके उपसर्ग-उपद्रव एवं भयंकर दृश्य उपस्थित करता है । कभी उसकी माता और पिताकी दुर्दशाके दृश्य सामने उपस्थित कर उसकी दृढ़ताको कम करना चाहता है, तो कभी सिंह, व्याघ्र, सर्प आदिके भयावह रूप प्रदर्शित कर उसे भीत बनाना चाहता है पर धन्य रे रावण ! वह सब उपद्रव सहनकर रंच मात्र भी अपने लक्ष्यसे विचलित नहीं होता है और अनेकों विद्याएँ सिद्ध कर वापस लौटता है । सुन्दर तो था ही इसलिए अनेक राजकुमारियोंके साथ उसका सम्बन्ध होता है। मन्दोदरी-जैसी पवित्र और विचारशीला कन्याके साथ उसका पाणिग्रहण होता है। अनन्तवीर्य केवली के पास रावण प्रतिज्ञा लेता है कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे हाथ नहीं लगाऊँगा। रावणका विवेक उस समय पाठकको बरबस आकृष्ट कर लेता है जब वह नलकूबरकी स्त्रीका प्रेम-प्रस्ताव ठुकरा देता है और उसे सुन्दर शिक्षा देता है। राजा मरुत्वके हिंसापूर्ण यज्ञमें नारदकी दुर्दशाका समाचार सुनते ही रावण उसकी रक्षाके लिए दौड़ पड़ता है और उसका पाखण्डपूर्ण यज्ञ नष्ट कर सद्धर्मकी प्रभावना करता है । वरुणके युद्ध में कुम्भकर्ण वरुणके नगरमें प्रजाको बह-बेटियोंको बन्दी बनाकर रावणके सामने उपस्थित करता है, तब रावण कुम्भकर्णको फटकार लगाता है वह बड़ी मार्मिक है। वह कहता है भले आदमी ! वरुणके साथ तेरी लड़ाई थी, तूने निरपराध नागरिकोंकी स्त्रियोंको इस तरह संकट में क्यों डाला ? क्यों तुने उनका अपमान किया? तु यदि अपनी कुशल चाहता है तो सम्मानके साथ इन्हें इनके घर वापस कर । अनेक राजाओंको दिग्विजयमें परास्त कर रावण इन्द्रको बन्दी बनाता है। उसके निवास स्थानपर दूसरे दिन इन्द्रका पिता आता है। उसके साथ रावण कितनी नम्रतासे प्रस्तुत होता है मानो विनयका अवतार ही हो। आचार्य रविषेणने उस समय उसकी विनय प्रदर्शित कर जो उसे ऊंचा उठाया है वह हृदयको गद्गद कर देती है । इस तरह हम देखते हैं कि रावण अहंकारी प्रतिद्वन्द्वी विद्याधरोंका उन्मूलन कर भरतक्षेत्रके दक्षिण दिस्थित तीन खण्डों एवं विजयाध पर्वतपर अपना शासन स्थापित करता है। यह राक्षस नहीं था राक्षसवंशी था। वाल्मीकिने इसे राक्षस घोषित कर वस्तुस्थितिका अपलाप किया है। 'भवितव्यता बलीयसी के सिद्धान्तानुसार रावण रामकी स्त्री सीताको देख उसपर मोहित होता है और छलसे उसका हरण करता है। लंकाकी अशोक वाटिकामें सीताको रखता है, सब प्रकारसे अनुनय-विनय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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