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________________ द्वादशं पर्व २८७ महाबलोऽयमेतस्य कुमारो नोचितो रणे । 'उद्यच्छ स्वयमेव त्वं जहि शत्रोरहंयुताम् ॥२५॥ ततोऽभिमुखमायान्तं दृष्ट्वाखण्डलमूर्जितम् । संस्मृत्य मालिमरणं श्रीमालिवधदीपितः ॥२५२॥ दृष्ट्वा च शत्रुमिः पुत्रं वेष्व्यमानं समन्ततः । दधाव रावणः क्रोधाद् रथेनानिलरंहसा ॥२५३।। मटानाममवद्युद्धमेतयो रोमहर्षणम् । तुमुलं शस्त्रसंघातघनध्वान्तसमावृतम् ।।२५४॥ ततः शस्त्रकृतध्वान्ते रक्तनीहारवर्तिनि । अज्ञायन्त भटाः शूरास्तारारावेण केवलम् ॥२५५।। प्रेरिता स्वामिनो मक्त्या पूर्वानादरचोदिताः । प्रहारोत्थेन कोपेन मटा ययधिरे भृशम् ॥२५६॥ गदाभिः शक्तिभिः कुन्तैर्मुसलैरसिभिः शरैः । परिधैः कनकैश्चक्रः करवालीभिरंघ्रिपैः ॥२५७॥ शूलैः पाशैर्मुशुण्डीभिः कुठारैमुद्रैनैः । प्रावमिर्लाङ्गलैर्दण्डैः कौणैः सायकवेणुमिः ॥२५॥ अन्यैश्च विविधैः शस्त्ररन्योन्यच्छेदकारिमिः । करालमभवद् व्योम तदाघातोत्थितानलम् ।।२५९॥ क्वचिद्ग्रसदिति ध्वानो भवत्यन्यत्र शूदिति । क्वचिद्रणरणारावः क्वचित्किणिकिणिस्वनः ॥२६॥ पत्रपायतेऽन्यत्र तथा दमदमायते । छमाछमायतेऽन्यत्र तथा पटपटायते ॥२६॥ छलछलायतेऽन्यत्र टटदायते तथा । तटत्तटायतेऽन्यत्र तथा चटचटायते ॥२६२॥ घग्घग्घग्घायतेऽन्यत्र रणं शस्त्रोत्थितैः स्वरैः । शब्दात्मकमिवोद्भूतं तदा त्वजिरमण्डलम् ॥२६३॥ हन्यते वाजिना वाजी वारणेन मतङ्गजः । तत्रस्थेन च तत्रस्थो रथेन ध्वस्यते रथः ॥२६॥ पदातिभिः समं युद्धं कर्तुं पादातमुद्यतम् । यथा पुरोगतैकैकभटपाटनतत्परम् ॥२६५॥ यह चूंकि महाबलवान् है इसलिए कुमार इन्द्रजित् युद्ध करनेके लिए इसके योग्य नहीं है अतः आप स्वयं ही उठिए और शत्रुका अहंकार नष्ट कीजिए ।।२५१॥ तदनन्तर बलवान् इन्द्रको सामने आता देख रावण वायुके समान वेगशाली रथसे सामने दौड़ा। उस समय रावण मालीके मरणका स्मरण कर रहा था और अभी हालमें जो श्रीमालीका वध हुआ था उससे देदीप्यमान हो रहा था। उस समय इन दोनों योद्धाओंका रोमांचकारी भयंकर युद्ध हो रहा था। वह युद्ध शस्त्र समुदायसे उत्पन्न सघन अन्धकारसे व्याप्त था। रावणने देखा कि उसका पूत्र इन्द्रजित सब ओरसे शत्रओं द्वारा घेर लिया गया है अतः वह कुपित हो आगे दौड़ा ॥२५२-२५४|| तदनन्तर जहाँ शस्त्रोंके द्वारा अन्धकार फैल रहा था और रुधिरका कुहरा छाया हुआ था ऐसे युद्ध में यदि शूरवीर योद्धा पहचाने जाते थे तो केवल अपनी जोरदार आवाज से ही पहचाने जाते थे ।।२५५॥ जिन योद्धाओंने पहले अपेक्षा भावसे युद्ध करना बन्द कर दिया था उनपर भी जब चोटें पड़ने लगी तब वे स्वामीकी भक्तिसे प्रेरित हो प्रहारजन्य क्रोधसे अत्यधिक युद्ध करने लगे ॥२५६।। गदा, शक्ति, कुन्त, मुसल, कृपाण, बाण, परिघ, कनक, चक्र, छुरी, अंह्निप, शूल, पाश, भुशुण्डी, कुठार, मुद्गर, धन, पत्थर, लांगल, दण्ड, कौण, बांसके बाण तथा एक दूसरेको काटनेवाले अन्य अनेक शस्त्रोंसे उस समय आकाश भयंकर हो गया था और शस्त्रोंके पारस्परिक आघातसे उसमें अग्नि उत्पन्न हो रही थी ॥२५७-२५९।। उस समय कहीं तो ग्रसद्-ग्रसद्, कहीं शूद्-शूद्, कहीं रण-रण, कहीं किण-किण, कहीं त्रप-त्रप, कहीं दम-दम, कहीं छमछम, कहीं पट-पट, कहीं छल-छल, कहीं टद्द-टद्द, कहीं तड़-तड़, कहीं चट-चट और कहीं घग्घघग्घकी आवाज आ रही थी। यथार्थ बात यह थी कि शस्त्रोंसे उत्पन्न स्वरोंसे उस समय रणांगण शब्दमय हो रहा था ॥२६०-२६३॥ घोड़ा घोडाको मार रहा था, हाथी हाथीको मार रहा था, घुड़सवार घुड़सवारको, हाथीका सवार हाथीके सवारको और रथ रथको नष्ट कर रहा था ॥२६४|| जो जिसके सामने आया उसीको चीरने में तत्पर रहनेवाला पैदल सिपाहियोंका झुण्ड १. उत्तिष्ठ । २. गर्वम् । ३. ताररावण-ब. । ४. पूर्वमारव म., पूर्वमारद ब. । ५. करवालिभिरध्रिपः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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