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________________ द्वादशं पर्व २ निपत्य पादयोस्तावजानुस्पृष्टमहीतलः । तमुवाच महावीरो जयन्त इति विश्रुतः ॥२२४॥ सत्येव मयि देवेन्द्र करोषि यदि संयुगम् । ततो भवत्कृतं जन्म त्वया मम निरर्थकम् ॥२२५॥ बालकोऽके भेजन्क्रीडां पुत्रप्रीत्या यदीक्षितः । स्नेहस्यानृण्यमंतस्य जनयामि तवाधुना ॥२२६॥ स त्वं निराकुलो भूत्वा तिष्ठ तात यथेप्सितम् । शत्रून् क्षणेन निःशेषानयं व्यापादयाम्यहम् ॥२२७॥ नखेन प्राप्यते छेदं वस्तु यत्स्वल्पयत्नतः । व्यापारः परशोस्तत्र ननु तात निरर्थकः ॥२२८॥ वारयित्वेत्यसौ तातं संयुगाय समुद्यतः । कोपावेशाच्छरीरेण असमान इवाम्बरम् ॥२२९॥ प्रतिश्रीमालि चायासीदायासपरिवर्जितः । गुप्तः पवनवेगेन सैन्येनोज्ज्वलहेतिना ॥२३॥ श्रीमाली चापि संप्राप्तं चिराद्योग्यं प्रतिद्विषम् । दृष्ट्वा तुष्टो दधावास्य संमुखं सैन्यमध्यगः ॥२३॥ अमुञ्चतां ततः क्रुद्धौ शरासारं परस्परम् । कुमारौ सतताकृष्टदृष्टकोदण्डमण्डलौ ॥२३२॥ तयोः कुमारयोर्युद्धं निश्चलं पृतनाद्वयम् । ददर्श विस्मयप्राप्तमानसं रेखया स्थितम् ॥२३३॥ कनकेन ततो मित्त्वा जयन्तो विरथीकृतः । श्रीमालिना स्वसैन्यस्य कुर्वता संमदं परम् ॥२३॥ मूर्च्छया पतिते तस्मिन् स्ववर्गस्यापतन्मनः । मूर्छायाश्च परित्यागादुत्थिते पुनरुस्थितम् ॥२३५।। आहत्य मिण्डिमालेन जयन्तेन ततः कृतः । श्रीमाली विरथो रोषात्प्रहारेणातिवर्द्धितात् ॥२३६॥ ततः परबले तोषनि?षो निर्गतो महान् । निजे च यातुधानस्य समाक्रन्दध्वनिर्बले ॥२७॥ काँपती हुई सेवाको सान्त्वना देकर ज्योंही युद्धके लिए उठा त्योंही उसका महाबलवान् जयन्त नामका पुत्र चरणोंमें गिरकर तथा पृथिवीपर घुटने टेककर कहने लगा कि हे देवेन्द्र ! यदि मेरे रहते हुए आप युद्ध करते हैं तो आपसे जो मेरा जन्म हुआ है वह निरर्थक है ।।२२३-२२५।। जब मैं बाल्य अवस्थामें आपकी गोदमें क्रीड़ा करता था और आप पुत्रके स्नेहसे बार-बार मेरी ओर देखते थे आज मैं उस स्नेहका बदला चुकाना चाहता हूँ, उस ऋणसे मुक्त होना चाहता हूँ॥२२६॥ इसलिए हे तात! आप निराकुल होकर घरपर रहिए। मैं क्षण-भरमें समस्त शत्रुओंका नाश कर डालता हूँ ॥२२७|| हे तात! जो वस्तु थोड़े ही प्रयत्नसे नखके द्वारा छेदी जा सकती है वहाँ परशुका चलाना व्यर्थ ही है ॥२२८|| इस प्रकार पिताको मनाकर जयन्त युद्धके लिए उद्यत हुआ। उस समय वह क्रोधावेशसे ऐसा जान पड़ता था मानो शरीरके द्वारा आकाशको ही ग्रस रहा हो ॥२२९|| पवनके समान वेगशाली एवं देदीप्यमान शस्त्रोंको धारण करनेवाली सेना जिसकी रक्षा कर रही थी ऐसा जयन्त बिना किसी खेदके सहज ही श्रीमालीके सम्मुख आया ॥२३०॥ श्रीमाली चिर काल बाद रणके योग्य शत्रुको आया देख बहुत सन्तुष्ट हुआ और सेनाके बीच गमन करता हुआ उसकी ओर दौड़ा ॥२३१॥ तदनन्तर जिनके धनुर्मण्डल निरन्तर खिचते हुए दिखाई देते थे ऐसे क्रोधसे भरे दोनों कुमारोंने एक दूसरेपर बाणोंकी वर्षा छोड़ी ।।२३२॥ जिनका चित्त आश्चर्यसे भर रहा था और जो अपनी-अपनी रेखाओंपर खड़ी थीं ऐसी दोनों ओरकी सेनाएँ निश्चल होकर उन दोनों कुमारोंका युद्ध देख रही थीं ॥२३३॥ तदनन्तर अपनी सेनाको हर्षित करते हुए श्रीमालीने कनक नामक हथियारसे जयन्तका रथ तोड़कर रथरहित कर दिया ।।२३४॥ जयन्त मूर्छासे नीचे गिर पड़ा सो उसे गिरा देख उसकी सेनाका मन भी गिर गया और मूर्छा दूर होनेपर जब वह उठा तो सेनाका मन भी उठ गया ।।२३५॥ तदनन्तर जयन्तने भिण्डिमाल नामक शस्त्र चलाकर श्रीमालीको रथरहित कर दिया और अत्यन्त बढ़े हुए क्रोधसे ऐसा प्रहार किया कि वह मूच्छित होकर गिर पड़ा ।।२३६।। तब शत्रुसेनामें बड़ा भारी हर्षनाद हुआ और १. जमस्पृष्ट म.। २. जनक्रीडां म.। ३. त्वयाहं फलमेतस्य । ४. यथेक्षितम् म. । ५. यसमान क. । ६. दधाव = धावति स्म । ७. स तदाकृष्ट म.। ८. पृतनीद्वयम् म.। ९. शर्मदं म.। संमतं ख.। १०. स्त्रीमालिर् म. । ११. वर्धितान् म. । १२. बभौ म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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