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________________ पदमपुराणे न जातिर्गर्हिता काचिदगुणाः कल्याणकारणम् । व्रतस्थमपि चाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदः ॥२०॥ विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥२०॥ चातुर्वण्यं यथान्यच्च चाण्डालादिविशेषणम् । सर्वमाचारभेदेन प्रसिद्धिं भुवने गतम् ॥२०५।। अपूर्वाख्यश्च धर्मो न व्यज्यते यागकर्मणा । नित्यत्वाद् व्योमवद् व्यक्तरनित्यो वा घटादिवत् ॥२०६॥ फलं रूपपरिच्छेदः प्रदीपव्यक्त्यनन्तरम् । दृष्टं यथेह चापूर्वव्यक्तिकालं फलं भवेत् ॥२०७॥ शास्त्रेण चोदितत्वाच्च वेदीमध्ये पशोर्वधः । प्रत्यवायाय नेत्येतदयुक्तं येन तच्छणु ।।२०८॥ वेदागमस्य शास्त्रत्वमसिद्धं शास्त्रमुच्यते । तद्धि यन्मातृवच्छास्ति सर्वस्मै जगते हितम् ॥२०९।। प्रायश्चित्तं च निर्दोषे वक्तुं कर्मणि नोचितम् । अत्र तूक्तं ततो दुष्टं तच्चेदम भिधीयते ॥२१०॥ राजानं हन्त्यसौ सोमं वीरं वा नाकवासिनाम् । सोमेन यो यजेत्तस्य दक्षिणा द्वादशं शतम् ॥२१॥ शोधयत्यत्र देवानां शतं वीरं प्रतर्पणम् । प्राणानां दश कुर्वन्ति यैकादश्यात्मनस्तु सा ॥२१२॥ द्वादशी दक्षिणा या तु दक्षिणा सैव केवलम् । इतरासां च दोषाणां व्यापारो विनिवर्तने ॥२१३॥ वस्तुनिर्माण या व्यापारमें प्रवेश करनेसे लोग वैश्य कहे जाते हैं और श्रुत अर्थात् प्रशस्त आगमसे जो दूर रहते हैं वे शूद्र कहलाते हैं ॥२०२।। कोई भी जाति निन्दनीय नहीं है, गुण ही कल्याण करनेवाले हैं । यही कारण है कि प्रत धारण करनेवाले चाण्डालको भी गणधरादि देव ब्राह्मण कहते हैं ।।२०३॥ विद्या और विनयसे सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल आदिके विषयमें जो समदर्शी हैं वे पण्डित कहलाते हैं अथवा जो पण्डितजन हैं वे इन सबमें समदर्शी होते हैं ॥२०४। इस प्रकार ब्राह्मणादिक चार वर्ण और चाण्डाल आदि विशेषणोंका जितना अन्य वर्णन है वह सब आचारके भेदसे हो संसारमें प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है ॥२०५॥ इसके पूर्व तुमने कहा था कि यज्ञसे अपूर्व अथवा अदृष्ट नामका धर्म व्यक्त होता है सो यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि अपूर्व धर्म तो आकाशके समान नित्य है वह कैसे व्यक्त होगा? और यदि व्यक्त होता ही है तो फिर वह नित्य न रहकर घटादिके समान अनित्य होगा ॥२०६।। जिस प्रकार दीपकके व्यक्त होनेके बाद रूपका ज्ञान उसका फल होता है उसी प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिरूपी फल भी अपूर्वधर्मके व्यक्त होनेके बाद ही होना चाहिए पर ऐसा नहीं है ।।२०७|| तुमने कहा है कि वेदीके मध्यमें पशुओंका जो वध होता है वह शास्त्र निरूपित होनेसे पापका कारण नहीं है सो ऐसा कहना अयुक्त है उसका कारण सुनो ।।२०८।। सर्वप्रथम तो वेद शास्त्र हैं यही बात असिद्ध है क्योंकि शास्त्र वह कहलाता है जो माताके समान समस्त संसारके लिए हितका उपदेश दे ॥२०९।। जो कार्य निर्दोष होता है उसमें प्रायश्चित्तका निरूपण करना उचित नहीं है परन्तु इस याज्ञिक हिंसामें प्रायश्चित्त कहा गया है इसलिए वह सदोष है। उस प्रायश्चित्तका कुछ वर्णन यहां किया जाता है ।।२१०॥ जो सोमयज्ञमें सोम अर्थात् चन्द्रमाके प्रतीक रूप सोम लतासे यज्ञ करता है जिसका तात्पर्य होता है कि वह देवोंके वीर सोम राजाका हनन करता है उसके इस यज्ञकी दक्षिणा एक सौ बारह गौ है ।।२१।। इन एक सौ बारह दक्षिणाओंमें-से सौ दक्षिणाएँ देवोंके वीर सोमका शोधन करती हैं, दस दक्षिणाएं प्राणोंका तर्पण करती हैं, ग्यारहवीं दक्षिणा आत्माके लिए है और जो बारहवीं दक्षिणा है वह केवल दक्षिणा ही १. -मविधीयते म. । २. 'अस्माक' सोमो राजा' इति श्रुत्या विशेषणविशेष्यभावः । ३. द्वादशा क. । 'गवां शतं द्वादशं वाऽतिक्रामति' का. श्री. १०१२।१०। 'यथारम्भं द्वादश द्वादशायेभ्यः षट् षट् द्वितीयेभ्यश्चतस्रश्चतस्रस्तुतीयेभ्यस्तिस्रस्तिस्र इतरेभ्यः।' कात्यायनश्रौतसूत्र, १०।२।२४ । ४. शुभा क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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