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________________ २४३ एकादशं पर्व नाज्ञासीत् किल तल्लोकः स्फटिकं गगने ततः । स्थितं सिंहासन तस्य विवेदेति ततोऽवदत् ॥६९॥ वसो वितथसामर्थ्यात्तव सिंहासनं गतम् । भूमिमद्यापि ते युक्तं परमार्थनिवेदनम् ॥७॥ ततो मोहमदाविष्टस्तदैव पुनरभ्यधात् । प्रविष्टो धरणों सद्यः सिंहासनसमन्वितः ॥७१॥ महापापमरक्रान्तो हिंसाधर्मप्रवर्तनात् । गतस्तमस्तमोऽभिख्यां पृथिवीं घोरवेदनाम् ॥७२॥ ततो धिग धिग ध्वनिः प्रायो जातः कलकलो महान् । जनानां पापभीतानामुद्दिश्य वसुपर्वतौ ॥७३॥ संप्राप्तो नारदः पूजामहिंसाचारदेशनात् । एवमेव हि सर्वेषां यतो धर्मस्ततो जयः ॥७४॥ पापः पर्वतको लोके धिग्धिग्दण्डसमाहतः । दुःखितः शेषयन् देहमकरोत् कुत्सितं तपः ॥७५॥ कालं कृत्वामवत् करो राक्षसः पुरुविक्रमः | अपमानं च सस्मार धिग्दण्डाधिकमात्मनः ॥७६॥ अचिन्तयच्च लोकेन ममानेन परामवः । कृतस्ततः करिष्यामि प्रतिकर्मास्य दुःखदम् ॥७७॥ वितानं दम्भरचितं कृत्वा कर्म करोमि तत् । यत्रासक्तो जनो याति तिर्यडनरकदुर्गतीः ॥७८॥ ततो मानुषवेषस्थो वामस्कन्धस्थसूत्रकः । कमण्डल्वक्षमालादिनानोपकरणावृतः ॥७९॥ हिंसाकर्मपरं शास्त्रं घोरं करजनप्रियम् । अधीयानः सुदुष्टारमा नितान्तामङ्गलस्वरम् ॥४०॥ तापसान् दुर्विधान् बुद्धया सूत्रकण्ठादिकांस्तथा । व्यामोहयितुमुधुक्तो हिंसाधर्मेण निर्दयः ॥८१॥ तस्य पक्षे ततः पेतुः प्राणिनो मूढमानसाः । भविष्यदुःखसंभाराः शलभा इव पावके ॥८२॥ जो कहा है वही गुरुजी ने कहा था। इतना कहते ही राजा वसुका स्फटिक पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ६८ ॥ लोग उस स्फटिकको नहीं जानते थे इसलिए यही समझते थे कि राजा वसुका सिंहासन आकाशमें निराधार स्थित है ॥६६॥ नारदने राजाको सम्बोधते हुए कहा कि वसो ! मिथ्या पक्षका समर्थन करनेसे तुम्हारा सिंहासन पृथिवीपर आ पड़ा है। अतः अब भी सत्य पक्षका समर्थन करना तुम्हें उचित है ।।७०॥ परन्तु राजा वसु तो मोहरूपी मदिराके नशामें इतना निमग्न था कि उसने फिर भी वही बात कही। इस पापके फलस्वरूप राजा वसु शीघ्र ही सिंहासनके साथ ही साथ पृथिवीमें धंस गया ॥७१॥ हिंसाधर्मकी प्रवृत्ति चलानेसे वह बहुत भारी पापके भारसे आक्रान्त हो बहुत भारी वेदनावाली तमस्तमःप्रभा नामक सातवीं पृथिवीमें गया ॥७२॥ तदनन्तर पापसे भयभीत मनुष्य राजा वसु और पर्वतको लक्ष्य कर धिक्-धिक कहने लगे जिससे बड़ा भारी कोलाहल उत्पन्न हुआ |७३।। अहिंसापूर्ण आचारका उपदेश देनेके कारण नारद सम्मानको प्राप्त हुआ। सब लोगोंके मुखसे यही शब्द निकल रहे थे कि 'यतो धर्मस्ततो जयः' जहाँ धर्म वहाँ विजय ।।७४|| पापी पर्वत, लोकमें धिक्काररूपी दण्डकी चोट खाकर दुःखी हो शरीरको सुखाता हुआ कुतप करने लगा ।।७५।। अन्तमें मरण कर प्रबल पराक्रमका धारक दुष्ट राक्षस हुआ। उसे पूर्व पर्यायमें जो अपमान और धिक्काररूपी दण्ड प्राप्त हुआ था उसका स्मरण हो आया ॥७६॥ वह विचार करने लगा कि लोगोंने मेरा पराभव किया था इसलिए मैं इसका दुःखदायी बदला लूंगा ॥७७।। मैं कपटपूर्ण शास्त्र रचकर ऐसा कार्य करूँगा कि जिसमें आसक्त हुए मनुष्य तिथंच अथवा नरक-जैसी दुर्गतियोंमें जावेंगे ॥७८॥ तदनन्तर उस राक्षसने मनुष्यका वेष रखा, बायें कन्धेपर यज्ञोपवीत पहना और हाथसे कमण्डलु तथा अक्षमाला आदि उपकरण लिये ॥७९।। इस प्रकार हिंसा कार्यों की प्रवृत्ति करानेमें तत्पर तथा क्रूर मनुष्योंको प्रिय भयावह शास्त्रका अत्यन्त अमांगलिक स्वरमें उच्चारण करता हआ वह दष्ट राक्षस पथिवीपर भ्रमण करने लगा ॥८॥ वह स्वभावसे निर्दय था तथा बद्धिहीन तपस्वियों और ब्राह्मणोंको मोहित करने में सदा तत्पर रहता था ||८१॥ तदनन्तर जिन्हें भविष्यमें दुःख प्राप्त होनेवाला था ऐसे मूर्ख प्राणी उसके पक्षमें इस प्रकार पड़ने लगे जिस प्रकार १. सिंहासने म.। २. ध्वनिस्तावज्जातः म.। ३. संस्मार म.। ४. विधानं -ढम्भचरितं म. कंडभरतं ()ख.। ५. यत्राशक्तो म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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