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________________ २३२ पपुराणे विरचय्य घनव्यूहमन्योऽन्यं पालनोद्यताः । विनापि भर्तृवाक्येन सोत्साहा योद्धमुत्थिताः ॥१०७॥ बले च राक्षसेशस्य रणं कर्त' समुद्यते । विचेरुरम्बरे वाचः सुराणामिति सत्वराः ॥१०८॥ अहो महानयं वीरैरन्यायः कर्तुमीप्सितः । भूगोचरैः समं यो मुद्यता यन्नभश्वराः १०९॥ अमी भूगोचराः स्वल्पा वराका ऋजुचेतसः । विद्यामायाकृतोऽत्यन्तं बहवश्व नमश्चराः ॥११०॥ इति श्रुत्वाथ खे शब्दं पुनरुक्तं समाकुलम् । त्रपायुक्ता भुवं याताः खेचराः साधुवृत्त यः ॥१११॥ असिवाणगदाप्रासैरथ जघ्नुः परस्परम् । तुल्यप्रतिभटारब्धे रणे रावणमानवाः ॥११२॥ रथिनो रथिभिः साधं तुरङ्गास्तुरगैरमो । सार्क गजैर्गजाः सत्रा पादातं च पदातिमिः ॥११३॥ न्यायेन योद्धमारब्धाः क्रमानीतपराजयाः । शस्त्रसंपातनिष्पेषसमुत्थापितवह्नयः ॥११॥ भङ्गासन्नं ततः सैन्यं निजं वीक्ष्य परैर्दुतम् । सहस्ररश्मिरारुह्य रथमुद्धं समागतः ॥११५॥ किरीटी कवची चापि तेजो बिभ्रदनुत्तमम् । विद्याधरबलं दृष्ट्वा स न बिभ्ये मनागपि ॥११६॥ स्वामिनाधिष्ठिताः सन्तस्ततः प्रत्यागतौजसः । उद्गुणविस्फुरच्छना विस्मृतक्षतवेदनाः ॥११७॥ प्रविष्टा रक्षसां सैन्यं रणशौण्डा महीचराः । स्तम्बरमा इवोदभूतमदा गम्भीरमर्णवम् ॥११॥ ततः सहस्रकिरणो बिभ्राणः कोषमुन्नतम् । परांश्चिक्षेप बाणौधैर्धनानिव सदागतिः ॥११॥ प्रतीहारेण चाख्यातमिति कैलासकम्पिने । देव पश्य नरेन्द्रण केनाप्येतेन ते बलम् ॥१२०॥ __ परस्पर एक दूसरेकी रक्षा करनेमें तत्पर तथा उत्साहसे भरे सहस्ररश्मिके सामन्तोंने जब विद्याधरोंकी सेना आती देखी तो वे जीवनका लोभ छोड़ मेघव्यूहकी रचना कर स्वामीकी आज्ञाके बिना ही युद्ध करनेके लिए उठ खड़े हुए ॥१०६-१०७|| इधर जब रावणकी सेना युद्ध करनेके लिए उद्यत हुई तब आकाशमें सहसा देवताओंके निम्नांकित वचन विचरण करने लगे ॥१०८।। देवताओंने कहा कि अहो ! वीर लोग यह बड़ा अन्याय करना चाहते हैं कि भूमिगोचरियोंके साथ विद्याधर युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए हैं ।।१०९॥ ये बेचारे भूमिगोचरी थोड़े तथा सरल चित्त हैं और विद्याधर इनके विपरीत विद्या तथा मायाको करनेवाले एवं संख्या में बहुत है ।।११०॥ इस प्रकार आकाशमें बार-बार कहे हुए इस आकूलतापूर्ण शब्दको सूनकर अच्छी प्रवृत्तिवाले विद्याधर लज्जासे युक्त होते हुए पृथिवीपर आ गये ॥१११॥ तदनन्तर समान योद्धाओंके द्वारा प्रारम्भ किये हुए युद्ध में रावणके पुरुष परस्पर तलवार, बाण, गदा और भाले आदिसे प्रहार करने लगे ॥११२।। रथोंके सवार रथोंके सवारोंके साथ, घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ, हाथियोंके सवार हाथियोंके सवारोंके साथ, और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगे ॥११३।। जिन्हें क्रम-क्रमसे पराजय प्राप्त हो रहा था और जिनके शस्त्र-समूहकी टक्करसे अग्नि उत्पन्न हो रही थी ऐसे योद्धाओंने न्यायपूर्वक युद्ध करना शुरू किया॥११४॥ जब सहस्ररश्मिने अपनी सेनाको शीघ्र ही नष्ट होनेके निकट देखा तब उत्तम रथपर सवार हो तत्काल आ पहुँचा ।।११५।। उत्तम किरीट और कवचको धारण करनेवाला सहस्ररश्मि उत्कृष्ट तेजको धारण करता था इसलिए विद्याधरोंकी सेना देख वह जरा भी भयभीत नहीं हुआ ॥११६।। तदनन्तर स्वामीसे सहित होनेके कारण जिनका तेज पुनः वापस आ गया था, जिनके ऊपर खुले हुए छत्र लग रहे थे और जिन्होंने घावोंका कष्ट भुला दिया था ऐसे रणनिपुण भूमिगोचरी राक्षसोंकी सेनामें इस प्रकार घुस गये जिस प्रकार कि मदोन्मत्त हाथी गहरे समुद्रमें घुस जाते हैं ॥११७-११८।। जिस प्रकार वायु मेघोंको उड़ा देता है उसी प्रकार अत्यधिक क्रोधको धारण करनेवाला सहस्ररश्मि बाणोंके समूहसे शत्रुओंको उड़ाने लगा ।।११९।। यह देख द्वारपालने रावणसे निवेदन किया कि हे देव ! देखो १. वाणि म. । २. सार्धम् । ३. निश्शेष ख., म. । ४. श्रेष्ठम् । रथमुध्वंसमागतः म. । ५. प्रस्फुरच्छत्रा क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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