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________________ पद्मपुराणें पीनस्तनकृतान्योन्यपीडनाञ्चलकुण्डलाः । रणेत्कारि तुलाकोटिवाचालचरणद्वयाः ॥ ५२५॥ किं न पश्यसि हा मातः पार्श्वतो भव दुर्भगे । देहि मार्ग व्रजामुष्मादपि नारि न शोभले ॥५२६|| निगदत्येवमादीनि विकचाम्बुरुहाननाः । मुक्त्वा व्यापारजातानि तमैक्षन्त पुराङ्गनाः ॥५२७॥ पुरचूडामणी गेहे स्वस्मिन् सत्कृतभूषणे । सुखं सान्तः पुरस्तस्थौ कृतान्तस्य विमर्दकः ॥ ५२८ ॥ शेषा अपि यथास्थानं स्थिता विद्याधराधिपाः । प्राप्नुवन्तो महानन्दं सततं त्रिदशा इव ॥ ५२९॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् विविधरत्नसमागमसंपदः प्रबल शत्रुसमूलविमर्दनम् । सकलविष्टपगामि यशः सितं भवति निर्मितनिर्मलकर्मणाम् ॥५३०॥ रिपव उग्रतरा विषयाह्वया अपनयन्ति भुवखितये स्मृतिम् । बहिरवस्थितशत्रुगणः पुनः सततमानमेते पदनन्तरम् ॥५३१ ॥ इति विचिन्त्य न युक्तमुपासितुं विषयशत्रुगणं पुरुचेतसः । अवटमेति जनस्तमसा ततं न तु रवेः किरणैरवभासितम् ॥५३२॥ इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशग्रीवाभिधानं नामाष्टमं पर्व ॥ ८ ॥ २०६ मोतियोंके हार तथा अन्य आभूषण टूट-टूटकर गिर रहे थे || ५२४ || कितनी ही स्त्रियाँ अपने स्थूल स्तनोंसे एक दूसरेको पीड़ा पहुँचा रही थीं और उससे उनके कुण्डल हिल रहे थे । कितनी ही स्त्रियोंके दोनों पैर रुनझुन करते हुए नूपुरोंसे झंकृत हो रहे थे || ५२५ || कोई स्त्री सामने खड़ी दूसरी से कह रही थी कि हे माता ! क्या देख नहीं रही हो ? अरी दुभंगे ! जरा बगलमें हो जा, मुझे भी रास्ता दे दे । कोई कह रही थी अरी भली आदमिन ! तू यहाँसे चली जा, तू यहाँ शोभा नहीं देती || ५२६ || इत्यादि शब्द वे स्त्रियाँ कर रहीं थीं । उस समय उनके मुखकमल हर्षसे खिल रहे थे । वे अन्य सब काम छोड़कर एक दशाननको ही देख रही थीं ||५२७|| इस प्रकार यमका मानमर्दन करनेवाला दशानन, लंका नगरी में स्थित नूड़ामणिके समान मनोहर अपने सुसज्जित महल में अन्तःपुर सहित सुखसे रहने लगा || ५२८|| इसके सिवाय अन्य विद्याधर राजा भी देवोंके समान निरन्तर महाआनन्दको प्राप्त हुए यथायोग्य स्थान में रहने लगे || ५२९ || गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जो निर्मल कार्य करते हैं उन्हें नाना प्रकारके रत्नादि सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है, उनके प्रबल शत्रुओंका समूह नष्ट होता है और समस्त संसार में फैलनेवाला उज्ज्वल यश उन्हें प्राप्त होता है ||५३०|| पंचेन्द्रियोंके विषय सबसे प्रबल शत्रु हैं सो जो निर्मल कार्य करते हैं उनके ये प्रबल शत्रु भी तीनों लोकोंमें अपनी स्मृति नष्ट कर देते हैं अर्थात् इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं कि उनका स्मरण भी नहीं रहता। इसी प्रकार बाह्यमें स्थित होनेवाला जो शत्रुओं का समूह है वह भी निर्मल कार्य करनेवाले मनुष्योंके चरणोंके समीप निरन्तर नमस्कार करता रहता है । भावार्थ - निर्मल कार्य करनेवाले मनुष्योंके अन्तरंग और बहिरंग दोनों ही शत्रु नष्ट हो जाते हैं ||५३१|| ऐसा विचारकर हे श्रेष्ठ चित्तके धारक पुरुषो ! विषयरूपी शत्रुसमूहकी उपासना करना उचित नहीं है । क्योंकि उनकी उपासना करनेवाला मनुष्य अन्धकारसे युक्त नरकरूपी गर्तमें पड़ता है न कि सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशमान उत्तम स्थानको प्राप्त होता है ।।५३२॥ इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध रविषेणाचार्यनिर्मित पद्मचरित ग्रन्थमें दशाननका कथन करनेवाला अष्टम पर्व समाप्त हुआ ॥ ८ ॥ O १. रणत्करि म. । २. पुरे चूडामणी म, पुरश्चूडामणी ब । ३. शेषाश्चापि म । ४. सुवस्तुनये म., ब. । ५. मानयते म. । ६. यततं नरम् म., ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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