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________________ अष्टमं पर्व १९३ मनांसि पौरनारीणामुच्चिन्वन् रूपपाणिना। प्रविवेश पुरं स्वेदबिन्दुमुक्ताफलान्वितः ॥३४६॥ नराधिपस्य कन्यानां परिणीतं ततः शतम् । तेन सर्वत्र चासक्ता हरिषेणमयी कथा ॥३४७॥ महान्तमपि संप्राप्तः संमानं स नरेश्वरात् । स्त्रीरत्नेन विना मेने तां वर्षमिव शर्वरीम ॥३४॥ अचिन्तयच्च नूनं सा मया विरहिताधुना । मृगीवाकुलता प्राप्ता परमां विषमे वने ॥३४९।। सकृदेषा कथंचिच्चेत् त्रियामा क्षयमेष्यति । गमिष्यामि ततो बालामतां दागनुकम्पितुम् ॥३५०॥ विचिन्तत्येवमेतस्मिन् शयनीयेऽतिशोभने । चिरेण निद्रया लब्धं पदमत्यन्तकृच्छुतः ॥३५॥ स्वप्नेऽपि च स तामेव ददर्शाम्भोजलोचनाम् । प्रायो हि मानसस्यास्य सैव गोचरतामगात् ॥३५२।। अथ वेगवती नाम्ना कलागुणविशारदा । खेचराधिपकन्यायाः सखी तमहरत् क्षणात् ॥३५३।। ततो निद्राक्षये दृष्ट्वा ह्रियमाणं स्वमम्बरे । पापे हरसि मां कस्मादिति व्याहृत्य कोपतः ॥३५४॥ दृष्टनिःशेषताराक्षः संदष्टरदनच्छदः । मुष्टिं बबन्ध तां हन्तुं वज्रमुद्गरसंनिमाम् ॥३५५।। ततस्तं कुपितं दृष्टा पुरुषं चारुलक्षणम् । विद्याबलसमृद्वापि शङ्किता सेत्यभाषत ॥३५६॥ आरूढस्तरुशाखायां छिन्ते तस्या यथा नरः । मूलं तथा करोषि त्वं ममायुष्मन् विहिंसनम् ॥२५७।। यदर्थ नीयते तात वं मया तद्गतो भवान् । सत्यं ज्ञास्यसि नह्यस्य वपुषस्तव दुःखिता ॥३५८॥ अचिन्तयच्च भद्रेयं वनिता चारुभाषिणी । आकृतिः कथयत्यस्याः परपीडा निवृत्तताम् ॥३५९॥ आरूढ़ हुआ ॥३४५।। जो पसीनेकी बूंदोंके बहाने मानो मोतियोंसे सहित था ऐसा हरिषेण अपने सौन्दर्यरूपी हाथसे नगरकी स्त्रियोंका मन संचित करता हुआ नगरमें प्रविष्ट हुआ ॥३४॥ तदनन्तर उसने राजाकी सौ कन्याओंके साथ विवाह किया। इस प्रकारसे जहाँ देखो वहींसर्वत्र हरिषेणकी चर्चा फैल गयी ||३४७|| यद्यपि उसने राजासे बहुत भारी सम्मान प्राप्त किया था तो भी तपस्वियोंके आश्रममें जो स्त्रीरत्न देखा था उसके बिना उसने एक रातको वर्षके समान समझा ॥३४८|| वह विचार करने लगा कि इस समय निश्चय ही वह कन्या मेरे बिना विषम वनमें हरिणीके समान परम आकलताको प्राप्त होती होगी ॥३४९॥ यदि यह रात्रि किसी एक बार भी समाप्त हो जाये तो मैं शीघ्र ही उस बालापर दया करनेके लिए दौड़ पड़ें गा ||३५०॥ यह अत्यन्त सुशोभित शय्यापर पड़ा हुआ ऐसा विचार करता रहा। विचार करते-करते बड़ी देर बाद बहुत कठिनाईसे उसे नींद आयो ॥३५१।। स्वप्नमें भी यह उसी कमल-लोचनाको देखता रहा सो ठीक ही है क्योंकि प्रायः करके इसके मनका वही एक विषय रह गयी थी॥३५२|| अथानन्तर विद्याधर राजाकी कन्याकी सहेली वेगवती जो कि सर्व प्रकारकी कलाओं और गुणोंमें विशारद थी, सोते हुए हरिषेणको क्षण एकमें हर कर ले गयी ॥३५३।। जब उसकी निद्रा भग्न हुई तो उसने अपने आपको आकाशमें हरा जाता देख क्रोधपूर्वक वेगवतीसे कहा कि रो पापिनि! तू.मुझे किस लिए हर लिये जा रही है ? ॥३५४॥ जिसके नेत्रोंकी समस्त पुतलियाँ दिख रही थीं तथा जिसने ओंठ ईस रखा था ऐसे हरिषेणने उस वेगवतीको मारनेके लिए वज्रमय मदगरके समान मटी बाँधी ॥३५५।। तदनन्तर सन्दर लक्षणोंके धारक हरिषेणको कुपित देख वेगवती यद्यपि विद्याबलसे समृद्ध थी तो भी भयभीत हो गयी। उसने उससे कहा कि हे आयुष्मन् ! जिस प्रकार वृक्षकी शाखापर चढ़ा कोई मनुष्य उसीकी जड़को काटता है उसी प्रकार मुझपर आरूढ़ हुए तुम मेरा ही घात कर रहे हो ॥३५६-३५७॥ हे तात! मैं तुझे जिस लिए ले जा रही हूँ तुम जब उसको प्राप्त होओगे तब मेरे वचनोंकी यथार्थता जान सकोगे। यह निश्चित समझो कि वहाँ जाकर तुम्हारे इस शरीरको रंचमात्र भी दुःख नहीं होगा ॥३५८।। वेगवतीका कहा सुनकर हरिषेणने विचार किया कि यह स्त्री मन्द्र तथा मधुरभाषिणी है। १. शर्वरी म. । २. द्रागनुचिन्तनम् म. । ३. विचिन्तयत्येव म. । ४. छिन्ने म. । - २५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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