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________________ अष्टमं पर्व १८७ अन्तःपुरमहापद्मखण्डमध्यगतः सुखी । अव्याहतगतिः स्वेच्छाकृतविभ्रमभूषणः ॥२६॥ चापत्रिशूलनिस्त्रिंशप्रासपाशादिपाणिमिः । भृत्यैरनुगतो भक्तैर्विहिताद्भुतकर्मभिः ॥२६२॥ कृतशत्रुसमूहान्तैः सामन्तबद्धमण्डलैः । गुणप्रवणचेतोमिर्महाविभवशोभितः ॥२६३॥ वरविद्याधरीपाणिगृहीतैश्चारुचामरः । वीज्यमानो विलिप्ताङ्गो गोशीर्षादिविलेपनैः ॥२६॥ उच्छितेनातपत्रेण रजनीकरशोभिना। यशसेवागतः शोमां लब्धेनारातिभङ्गतः ॥२६५॥ उदारं भानुवत्तेजो दधानः पुण्यजं फलम् । विन्दन् दक्षिणमम्भोधिं ययाविन्द्र समः श्रिया ॥२६६॥ तस्यानुगमनं चक्र कुम्भकर्णो गजस्थितः । विभीषणो रथस्थश्च स्वगर्व विभवान्वितः ॥२६७॥ महादैत्यो मयोऽप्येनमन्वियाय सबान्धवः । सामन्तैः सहितः सिंहशरभादियुतै रथैः ॥२६॥ मारीचोऽम्बरविद्युच्च वज्रो वज्रोदरो बुधः । वज्राक्षः रनक्रश्च सारणः सुनयः शुकः ॥२६९॥ मयस्य मन्त्रिणोऽन्ये च बहवः खेचराधिपाः । अनुजग्मुरुदारेण विभवेन समन्विताः ॥२७॥ दक्षिणाशामशेषां स वशीकृत्य ततोऽन्यतः । विजहार महीं पश्यन् सवनाद्विसमुद्रगाम् ॥२७१॥ अथासावन्यदापृच्छत् सुमालिनसुदद्भुतः । उच्चगंगनमारूढो विनयानतविग्रहः ॥२७२॥ सरसीरहितेऽमुब्मिन् पूज्यपर्वतमूर्द्धनि । वनानि पश्य पद्माना जातान्येतन्महाद्भुतम् ॥२७३॥ तिष्टन्ति निश्चलाः 'स्वामिन् कथमत्र महीतले । पतिता विविधच्छायाः सुमहान्तः पयोमुचः ॥२७४॥ तथा बन्धुजनोंके साथ चला ॥२६०॥ वह उस विमानके अन्दर अन्तःपुररूपी महाकमलवनके बीचमें सुखसे बैठा था, उसकी गतिको कोई नहीं रोक सकता था, तथा अपनी इच्छानुसार उसने हावभावरूपी आभूषण धारण कर रखे थे ॥२६१।। चाप, त्रिशूल, तलवार, भाला तथा पाश आदि शस्त्र जिनके हाथ में थे तथा जिन्होंने अनेक आश्चर्यजनक कार्य करके दिखलाये थे ऐसे अनेक सेवक उसके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥२६२॥ जिन्होंने शत्रुओंके समूहका अन्त कर दिया था, जो चक्राकार मण्डल बनाकर पास खड़े थे, जिनका चित्त गुणोंके आधीन था तथा जो महावैभवसे शोभित थे ऐसे अनेक सामन्त उसके साथ जा रहे थे ॥२६३॥ गोशीर्ष आदि विलेपनोंसे उसका सारा शरीर लिप्त था तथा उत्तमोत्तम विद्याधरियाँ हाथमें लिये हुए सुन्दर चमरोंसे उसे हवा कर रही थीं ॥२६४॥ वह चन्द्रमाके समान सुशोभित ऊपर तने हुए छत्रसे ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो शत्रुकी पराजयसे उत्पन्न यशसे ही सुशोभित हो रहा हो ॥२६५।। वह सूर्यके समान उत्कृष्ट तेजको धारण कर रहा था तथा लक्ष्मीसे इन्द्रके समान जान पड़ता था। इस प्रकार पुण्यसे उत्पन्न फलको प्राप्त होता हुआ वह दक्षिणसमुद्रकी ओर चला ॥२६६।। हाथीपर बैठा हुआ कुम्भकर्ण और रथपर बैठा तथा स्वाभिमान रूपी वैभवसे युक्त विभीषण इस प्रकार दोनों भाई उसके पीछेपीछे जा रहे थे ।।२६७|| भाई-बान्धवों एवं सामन्तोंसे सहित महादैत्य मय भी, जिनमें सिंह-शरभ आदि जन्तु जुते थे ऐसे रथोंपर बैठकर जा रहा था॥२६८।। मरीच, अम्बरविद्युत्, वन, वज्रोदर, बुध, वज्राक्ष, क्रूरनक्र, सारण और सुनय ये राजा मयके मन्त्री तथा उत्कृष्ट वैभवसे युक्त अन्य अनेक विद्याधरोंके राजा उसके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥२६९-२७०॥ इस प्रकार समस्त दक्षिण दिशाको वश कर वह वन, पर्वत तथा समुद्रसे सहित पृथ्वीको देखता हुआ अन्य दिशाकी ओर चला ॥२७॥ _ अथानन्तर एक दिन विनयसे जिसका शरीर झुक रहा था, ऐसा दशानन आकाशमें बहुत ऊँचे चढ़कर अपने दादा सुमालीसे आश्चर्यचकित हो पूछता है कि हे पूज्य ! इधर इस पर्वतके शिखरपर सरोवर तो नहीं है पर कमलोंका वन लहलहा रहा है सो इस महाआश्चर्यको आप देखें ॥२७२-२७३।। हे स्वामिन् ! यहाँ पृथ्वीतलपर पड़े रंगबिरंगे बड़े-बड़े मेघ निश्चल होकर कैसे खड़े १. यशसा+इव+आगतः । २. उत्कटाश्चर्ययुक्तः । ३. निश्चलाश्चामी म., क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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