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________________ षष्ठं पर्व १३१ ततोऽसौ विलपन् भूरि भ्रातृस्नेहातिविक्लवः । सुकेशादिभिरानीतः प्रबोधमिति भाषणात् ॥४७९॥ युक्तमतन्न धीराणां कर्तुं क्षुद्रविचेष्टितम् । शोको हि पण्डितैर्दृष्टः पिशाचो भिन्ननामकः ॥४८०।। कर्मणां विनियोगेन वियोगः सह बन्धुना । प्राप्ते तत्रापरं दुःखं शोको यच्छति संततम् ॥४८१॥ 'प्रेक्षापूर्वप्रवृत्तेन जन्तुना सप्रयोजनः । व्यापारः सततं कृत्यः शोकश्चायमनर्थकः ॥४८२॥ प्रत्यागमः कृते शोके प्रेतस्य यदि जायते । ततोऽन्यानपि संगृह्य विदधीत जनः शुचम् ॥४८३॥ शोकः प्रत्युत देहस्य शोषीकरणमुत्तमम् । पापानामयमुद्रेको महामोहप्रवेशनः ॥४८४॥ तदेवं चैरिणं शोक परित्यज्य प्रसन्नधीः । कृत्ये कुरु मतिन्यासं नानुबन्धं त्यजत्यरिः ॥४८५॥ मूढाः शोकमहापङ्के मग्नाः शेषामपि क्रियाम् । नाशयन्ति तदायत्तजीवितैीक्षिता जनैः ॥४८६॥ बलीयान् वज्रवेगोऽयमस्मन्नाशस्य चिन्तकः । प्रतिकर्तव्यमस्माभिश्चिन्तनीयमिहाधुना ॥४८७॥ बलीयसि रिपो गुप्ति प्राप्य कालं नयेद् बुधः । तत्र तावदवाप्नोति न निकारमरातिकम् ॥४८८॥ प्राप्य तत्र स्थितः कालं कुतश्चिद् द्विगुणं रिपुम् । साधयन्नहि भूतीनामेकस्मिन् सर्वदा रतिः ॥४८९॥ अतः परम्परायातमस्माकं कुलगोचरम् । अलङ्कारपुरै नाम स्थानं मे स्मृतिमागतम् ॥४९०॥ कुलवृद्धास्तदस्माकं शंसन्त्यविदितं परैः। प्राप्य तत् स्वर्गलोकेऽपि न कुर्वीत पदं मनः ॥४९१॥ दुःखदायी क्यों हो गये ? ||४७८॥ इस प्रकार भाईके स्नेहसे दुःखी हुआ किष्किन्ध बहुत विलाप करता रहा । तदनन्तर सुकेश आदिने उसे इस प्रकार समझाकर प्रबोधको प्राप्त कराया ॥४७९।। उन्होंने कहा कि धीर-वीर मनुष्योंको क्षुद्र पुरुषोंके समान शोक करना उचित नहीं है। यथार्थमें पण्डितजनोंने शोकको भिन्न नामवाला पिशाच ही कहा है ॥४८०|| कर्मोके अनुसार इष्टजनोंके साथ वियोगका अवसर आनेपर यदि शोक होता है तो वह आगे के लिए और भी दुःख देता है ।।४८१।। विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मनुष्यको सदा वही कार्य करना चाहिए जो प्रयोजनसे सहित हो। यह शोक प्रयोजनरहित है अतः बुद्धिमान् मनुष्यके द्वारा करने योग्य नहीं है ॥४८२।। यदि शोक करनेसे मृतक व्यक्ति वापस लौट आता हो तो दूसरे लोगोंको भी इकट्ठा कर शोक करना उचित है ।।४८३।। शोकसे कोई लाभ नहीं होता बल्कि शरीरका उत्कट शोषण ही होता है। यह शोक पापोंका तीव्रोदय करनेवाला और महामोहमें प्रवेश करानेवाला है॥४८४|| इसलिए इस वैरी शो को छोड़कर बुद्धिको स्वच्छ करो और करने योग्य कार्यमें मन लगाओ क्योंकि शत्रु अपना संस्कार छोड़ता नहीं है ।।४८५।। मोही मनुष्य शोकरूपी महापंकमें निमग्न होकर अपने शेष कार्योंको भी नष्ट कर लेते हैं। मोही मनुष्योंका शोक तब और भी अधिक बढ़ता है जबकि अपने आश्रित मनुष्य उनको ओर दीनता-भरी दृष्टिसे देखते हैं ॥४८६॥ हमारे नाशका सदा ध्यान रखनेवाला अशनिवेग चूँकि अत्यन्त बलवान् है इसलिए इस समय हम लोगोंको इसके प्रतिकारका विचार अवश्य करना चाहिए ।।४८७।। यदि शत्रु अधिक बलवान् है तो बुद्धिमान् मनुष्य किसी जगह छिपकर समय बिता देता है। ऐसा करनेसे वह शत्रुसे प्राप्त होनेवाले पराभवसे बच जाता है ।।४८८|| छिपकर रहनेवाला मनुष्य जब योग्य समय पाता है तब अपनेसे दूनी शक्तिको धारण करनेवाले शत्रुको भी वश कर लेता है सो ठीक ही है क्योंकि सम्पदाओंकी सदा एक ही व्यक्तिमें प्रीति नहीं रहती ॥४८९।। अतः परम्परासे चला आया हमारे वंशका निवासस्थल अलंकारपुर (पाताल लंका) इस समय मेरे ध्यानमें आया है ।।४९०।। हमारे कुलके वृद्धजन उसकी बहुत प्रशंसा करते हैं तथा शत्रुओंको भी उसका पता नहीं है। वह इतना सुन्दर है कि उसे पाकर फिर मन स्वर्गलोककी आकांक्षा १. प्रेक्षापूर्वप्रयत्नेन जन्तुनाशप्रयोजन:-ख. । २. विकार म. । ३. भीरुणा-ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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