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________________ १६ पद्मपुराणे विभव देखकर रावण आदि भाई विद्याएँ सिद्ध करनेके लिए जाते हैं और रावण अनेक विद्याएँ प्राप्त कर लौटता है । इसके बाद रावण मन्दोदरी तथा ६००० अन्य कन्याओं के साथ विवाह करता है और दिग्विजयमें बहुत-से राजाओंको परास्त करता है। इस वर्णनमें इन्द्र, यम, वरुण आदि देवता न होकर साधारण विद्याधर राजा है। इस विजययात्रामें रावण नलकूबरको स्त्रीका प्रेमप्रस्ताव ठुकराकर अपने आपको बहुत ऊँचा उठाता है और केवलीका उपदेश सुनकर प्रतिज्ञा करता है कि मैं उस परनारीका उपभोग नहीं करूंगा जो मुझे स्वयं नहीं चाहेगी। रावण इन्द्रका अहंकार चूर करता है। बालिका अहंकार रावणके आक्रमणसे वैराग्यरूपमें परिणत हो जाता है जिससे बालि विरक्त होकर दैगम्बरी दीक्षा धारण करता है और सुग्रीवको राजा बनाता है। हनुमान की यथार्थ उत्पत्ति तथा उसकी बालचेष्टाएँ सबको चकित कर देती हैं। हनुमान् रावणकी ओरसे वरुणके विरुद्ध युद्ध करके चन्द्र नखाकी पुत्री अनंगकुसुमासे साथ विवाह करता है । खरदूषण रावणको बहन चन्द्रनखासे विवाह करता है । आगे चलकर दोनोंसे शम्बूक कुमारको उत्पत्ति होती है । [२] राम और सीताका जन्म तथा विवाह इस प्रकरणमें जनक तथा दशरथ की वंशावलीके बाद प्रारम्भमें दशरथकी तीन पत्नियोंका उल्लेख है.-१. कौशल्या, २. सुमित्रा और ३. सुप्रभा । एक दिन रावणको किसीसे विदित हआ कि मरी मृत्यु राजा जनक और दशरथकी सन्तानोंके द्वारा होगी। तब रावणने अपने भाई विभीषणको इन दोनोंकी हत्या करने के लिए भेजा। पर विभीषणके आनेके पहले ही नारद इन दोनों राजाओंको सचेत कर जाते हैं जिससे ये अपने महलोंमें अपने शरीरके अनुरूप पुतले छोड़कर बाहर निकल जाते हैं। विभीषण पुतलोंको ही सचमुचका राजा समझ मारकर तथा शिरको लवण समुद्रमें फेंक हमेशाके लिए निश्चिन्त हो जाता है । परदेश-भ्रमणके समय राजा दशरथ केकयीके स्वयंवर में पहुँचते हैं। केकयी दशरथके गले में माला डालती है। इसपर अन्य राजा बिगड़ उठते हैं। फलस्वरूप उनके साथ दशरथका युद्ध होता है। केकयी वीरांगना थी इसलिए स्वयं दशरथका रथ चलाती है। राजा दशरथ अपने पराक्रम और उसकी चातुरीसे युद्ध में विजयी होते हैं तथा अयोध्या वापस आकर राज्य करने लगते हैं। केकयीको चतुराईसे रीझकर दशरथने उसे मनचाहा वर मांगनेको कहा और उसने वरको राज्यभण्डारमें सुरक्षित करा दिया। केकयी समेत राजा दशरथकी चार रानियां हो जाती हैं, उनसे उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए। कौशल्यासे राम, इन्हींका दूसरा नाम पद्म या, सुमित्रासे लक्ष्मण, केकयीसे भरत और सुप्रभासे शत्रुघ्न । राजा जनककी विदेहा रानीके एक पुत्री सीता तथा एक पुत्र भामण्डल उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते ही प्रसूतिगृहसे एक पूर्वभवका वैरी भामण्डलका अपहरण कर लेता है । अपहरणके बाद भामण्डल एक विद्याधरको प्राप्त होता है। उसीके यहाँ उसका लालन-पालन होता है। नारदकी कृपासे सीताका चित्रपट देखकर भामण्डलका उसके प्रति अनुराग बढ़ता है। छलसे जनकको विद्याधर लोकमें बुलाया जाता है। भामण्डलके पिताके आग्रह करनेपर भी जनक उसके लिए पुत्री देना स्वीकृत नहीं करता है क्योंकि वह पहले राजा दशरथके पुत्र रामको देना स्वीकृत कर चुका था। निदान, विद्याधरने शर्त रखी कि यदि राम यह वज्रावर्त धनुष चढ़ा देंगे तो सीता उन्हें प्राप्त होगी अन्यथा हम अपने पुत्रके लिए बलात् छीन लेंगे। विवश होकर जनकने यह शर्त स्वीकृत कर ली। स्वयंवर हुआ और रामने उक्त धनुष चढ़ा दिया। सीताके साथ रामका विवाह हुआ। दशरथ विरक्त हो रामको राज्य देने लगे। तब केकयीने राज्य-भण्डारमें सुरक्षित वर मांगकर भरतको राज्य देने की इच्छा की। यह सुनकर राम लक्ष्मण सीताके साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। बीचमें कितने ही त्रस्त राजाओंका उद्धार किया। केकयी और भरत वनमें जाकर रामसे वापस चलनेका अनुरोध करते हैं पर सब व्यर्थ होता है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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