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________________ ८६ पद्मपुराणे आसतां तावदेते वा नाकलोकेश्वरा अपि । ज्वलिता विमवैर्याताः क्षणाद् दुःखेन भस्मताम् ॥२६३॥ येऽपि तीर्थकरा नाम त्रैलोक्यस्याभिनन्दकाः । शरीरं तेऽपि संत्यज्य गच्छन्त्यायुःपरिक्षये ॥२६४॥ महातरौ यथैकस्मिन्नुषित्वा रजनी पुनः । प्रभाते प्रतिपद्यन्ते ककुभो दश पक्षिणः ॥२६५।। एवं कुटुम्ब एकस्मिन् संगम प्राप्य जन्तवः । पुनः स्वां स्वां प्रपद्यन्ते गतिं कर्मवशानुगाः ॥२६६॥ कैश्चित्तच्चेष्टितं तेषां वपुश्चात्यन्तशोभनम् । विषयीकृतमक्षिभ्यामस्माकं तु कथागतम् ॥२६७।। बलवद्भयो हि सर्वेभ्यो मृत्युरेव महाबलः । आनीता निधनं येन बलवन्तो बलीयसा ॥२६॥ कथं स्फुटति नो वक्षः स्मृत्वा तेषां महात्मनाम् । विनाशं भरतादीनामहो चित्रमिदं परम् ॥२६९॥ फेनोर्मीन्द्रधनुःस्वप्नविद्युबुबुदसंनिमाः । संपदः प्रियसंपर्का विग्रहाश्च शरीरिणाम् ॥२७०॥ नास्ति कश्चिन्नरो लोके यो व्रजेदुपमानताम् । यथायममरस्तद्वद्वयं मृत्यूज्झिता इति ॥२७॥ येऽपि शोषयितुं शक्काः समुद्रं ग्रामसंकुलम् । कुर्युर्वा करयुग्मेन चूर्ण मेरुमहीधरम् ॥२७२॥ उद्धर्तुं धरणी शक्ता ग्रसितुं 'चन्द्रभास्करौ । प्रविष्टास्तेऽपि कालेन कृतान्तवदनं नराः ॥२७३॥ मृत्योर्दुर्लकितस्यास्य त्रैलोक्ये वशतां गते । केवलं व्युज्झिताः सिद्धा जिनधर्मसमुद्भवाः ॥२७॥ यथा ते बहवो याताः कालेन निधनं नृपाः । यास्यामो वयमप्येवं सामान्य जगतामिदम् ॥२७५॥ तत्र त्रिलोकसामान्ये वस्तुन्यस्मिन् समागते । शोकं कुर्याद्विबुद्धात्मा को नरो भवकारणम् ।।२७६॥ कथायामिति जातायां वीक्ष्यापत्यद्वयं पुनः । मानसे चक्रवर्तीदं चकारेङ्गितकोविदः ॥२७७॥ नहीं हैं ।।२६२।। अथवा इन सबको रहने दो, स्वर्गलोकके अधिपति भी जो कि वैभवसे देदीप्यमान रहते हैं क्षणभरमें दुःखसे भस्म हो जाते हैं ।।२६३।। अथवा इन्हें भी जाने दो, तीन लोकको आनन्दित करनेवाले जो तीर्थंकर हैं वे भी आयु समाप्त होनेपर शरीरको छोड़कर चले जाते हैं ।।२६४।। जिस प्रकार पक्षी रात्रिके समय किसी बड़े वृक्षपर बसकर प्रातःकाल दशों दिशाओंमें चले जाते हैं उसी प्रकार अनेक प्राणी एक कुटुम्बमें एकत्रित होकर कर्मों के अनुसार फिर अपनी गतिको चले जाते हैं ।।२६५-२६६।। किन्हींने उन पूर्व पुरुषोंकी चेष्टाएँ तथा उनका अत्यन्त सुन्दर शरीर अपनी आंखोंसे देखा है परन्तु हम कथामात्रसे उन्हें जानते हैं ।।२६७।। मृत्यु सभी बलवानोंसे अधिक बलवान् है क्योंकि इसने अन्य सभी बलवानोंको परास्त कर दिया है ।।२६८।। अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है कि भरत आदि महापुरुषोंके विनाशका स्मरण कर हमारी छाती नहीं फट रही है ।।२६९॥ जीवोंकी धनसम्पदाएँ, इष्टसमागम और शरीर, फेन, तरंग, इन्द्रधनुष, स्वप्न, बिजली और बबूलाके समान हैं ॥२७०|| संसारमें ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जो इस विषयमें उपमान हो सके कि जिस तरह यह अमर है उसी तरह हम भी अमर रहेंगे ||२७१।। जो मगरमच्छोंसे भरे समुद्रको सुखानेके लिए समर्थ हैं अथवा अपने दोनों हाथोंसे सुमेरु पर्वतको चूर्ण करनेमें समर्थ हैं अथवा पृथ्वीको ऊपर उठानेमें और चन्द्रमा तथा सूर्यको ग्रसने में समर्थ हैं वे मनुष्य भी काल पाकर यमराजके मुखमें प्रविष्ट हुए हैं ॥२७२-२७३।। तीनों लोकोंके प्राणी इस दुलंघनीय मृत्युके वश हो रहे हैं। यदि कोई बाकी छूटे हैं तो जिनधर्मसे उत्पन्न हुए सिद्ध भगवान् ही छूट हैं ॥२७४।। जिस प्रकार बहुत-से राजा कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुए हैं उसी प्रकार हम लोग भी विनाशको प्राप्त होंगे। संसारका यह सामान्य नियम है ।।२७५।। जो मृत्यु तीन लोकके जीवोंको समान रूपसे आती है उसके प्राप्त होनेपर ऐसा कौन विवेकी पुरुष होगा जो संसारके कारणभूत शोकको करेगा ॥२७६।। इस प्रकार वृद्ध मनुष्यके द्वारा यह चर्चा चल रही थी इधर चेष्टाओंके जानने में निपुण चक्रवर्तीने सामने सिर्फ दो पुत्र देखे । उन्हें देखकर वह मनमें विचार करने लगा १. चन्द्रभास्करा म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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