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________________ पञ्चमं पर्व पित्रोरेवं परिज्ञाय मयदुःखविवर्तनम् । भेजतं मममुजित्वा वैरं संसारकारणम् ॥११२॥ चक्रवर्ती ततोऽपृच्छदेतयोः पूर्वजन्मनि । बैरकारणमेवं च माषितं धर्मचक्रिणा ॥१३॥ जम्बूद्वीपस्य भरते पुरे पद्मकनामनि । सांख्यिको रम्भनामासीद् विषये प्रथितो धनी ॥११४॥ शश्यावलिसमाह्वानौ तस्य मैत्रीसमन्वितौ । शिष्यावत्यन्तविख्यातौ धनवन्तौ गुणोत्कटौ ॥११५॥ मा भूदाभ्यां ममोद्वर्तः संहताभ्यामिति द्रुतम् । तयोः से भेदमकरोनयशास्त्रविचक्षणः ॥११६॥ गोपालकेन संमन्य शशी मूल्यार्थमन्यदा । चिक्रीषुगां गृहं यावदायातो निजलीलया ॥११७॥ क्रीत्वा देवनियोगात्तामागच्छन्नावली पुरम् । गच्छता शशिना क्रोधान्निहतो म्लेच्छतामितः ॥११८॥ मृतः शशी बलीव> जातो म्लेच्छेन तेन च । हत्वा वैरानुबन्धेन भक्ष्यतामुपपादितः ॥११९॥ तिर्यग्नारकपान्थः सन्म्लेच्छो मूषकतां गतः। अभूच्छश्यपि मार्जारस्तेन हत्वा स मक्षितः ॥१२॥ पापकर्मनियोगेन प्राप्ती नरकभूमिषु । प्राप्यते सुमहद् दुःखं जन्तुमिर्भवसागरे ॥१२॥ भूयः संसृत्य काश्यां तौ दासौ जातौ सहोदरौ । दास्याः संभ्रमदेवस्य कूटकार्पटिकायौ ॥१२२॥ जिनवेश्मनि तौ तेन नियुक्तौ प्रेत्य पुण्यतः । रूपानन्दः सुरूपश्च जातौ भूतगणाधिपौ ॥१२३॥ शशिपूर्वो रजोवल्यां च्युत्वाऽभूत् कुलपुत्रकः । कुलंधरोऽपरः पुष्पभूतिः पुत्रः पुरोधसः ॥१२४॥ नामका विद्याधर हुआ। इसी वैरके कारण पूर्णमेघने सुलोचनको मारा है ।।११०-१११।। गणधर देवने सहस्रनयन और मेघवाहनको समझाया कि तुम दोनों इस तरह अपने पिताओंके सांसारिक दुःखमय परिभ्रमणको जानकर संसारका कारणभूत वैरभाव छोड़कर साम्यभावका सेवन करो ॥११२॥ तदनन्तर सगर चक्रवर्तीने पूछा कि हे भगवन् ! मेघवाहन और सहस्रनयनका पूर्व जन्ममें वैर क्यों हुआ? तब धर्मचक्रके अधिपति भगवान्ने उनके वैरका कारण निम्न प्रकार समझाया ॥११३। उन्होंने कहा कि जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी पद्मक नामक नगरमें गणित शास्त्रका पाठी महाधनवान् रम्भ नामका एक प्रसिद्ध पुरुष रहता था ॥११४।। उसके दो शिष्य थे-एक चन्द्र और दूसरा आवलि। ये दोनों ही परस्पर मैत्री भावसे सहित थे। अत्यन्त प्रसिद्ध धनवान् और गुणोंसे युक्त थे ॥११५।। नीतिशास्त्रमें निपुण रम्भने यह विचारकर कि यदि ये दोनों परस्परमें मिले रहेंगे तो हमारा पद भंग कर देंगे, दोनोंमें फूट डाल दी ।।११६।। एक दिन चन्द्र गाय खरीदना चाहता था सो गोपालके साथ सलाह कर मूल्य लेने के लिए वह सहज ही अपने घर आया था कि भाग्यवश आवलि उसी गायको खरीदकर अपने गांवकी ओर आ रहा था। बीचमें चन्द्रने क्रोधवश उसे मार डाला। आवलि मरकर म्लेच्छ हुआ ।।११७-११८।। और चन्द्र मरकर बैल हुआ सो म्लेच्छने पूर्व वैरके कारण उसे मारकर खा लिया ॥११९।। म्लेच्छ तिथंच तथा नरक योनिमें भ्रमण कर चूहा हुआ और चन्द्रका जीव बैल मरकर बिलाव हुआ सो बिलावने चहेको मारकर भक्षण किया ।।१२०॥ पाप कर्मके कारण दोनों ही मरकर नरकमें उत्पन्न हुए सो ठीक ही है क्योंकि प्राणी संसाररूपी सागरमें बहुत भारी दुःख पाते ही हैं ॥१२१॥ नरकसे निकलकर दोनों ही बनारसमें संभ्रमदेवकी दासीके कूट और कापंटिक नामके पुत्र हुए। ये दोनों ही भाई दास थे-दासवृत्तिका काम करते थे सो संभ्रमदेवने उन्हें जिनमन्दिर में नियुक्त कर दिया । अन्तमें मरकर दोनों ही पुण्यके प्रभावसे रूपानन्द और सुरूप नामक व्यन्तर देव हुए ॥१२२-१२३।। रूपानन्द चन्द्रका जीव था और सुरूप आवलिका जीव था सो रूपानन्द चय कर रजोवली नगरीमें कुलन्धर नामका कुलपुत्रक हुआ और सुरूप, पुरोहितका पुत्र पुष्पभूति हुआ।१२४॥ १. भजतः म.। २. संभेद म.। ३. पुरा ख.। ४. रूपानन्दसुरूपश्च स.। ५. रजोवाल्याम् म. । ६. पुत्रपुरोधसः क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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