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________________ तृतीयं पर्व लजिताः स्वेन रूपेण केचित्तु कुशचीवरम् । प्राप्तामीमिस्ततस्तृप्तिः फलैः शीतजलेन च ॥२९७॥ संभूय ते ततो भग्ना दुर्दशाचारवर्तिनः । विश्रब्धाः कर्तुमारब्धा दूरं गत्वा प्रधारणम् ॥२९८॥ तेषां केनचिदित्युक्तास्ततो भूपेन ते नृपाः । एतेन कथितं किंचित्कस्मैचिद्भवतामिति ॥२९९॥ नैतेन कथितं किंचिदस्मभ्यमिति ते ध्रवम् । ततोऽन्येनोदितं वाक्य मिति भोगाभिलाषिणा ॥३०॥ उत्तिष्ठत निजान देशान् ब्रजामोऽत्र स्थितेन किम् । प्राप्नुमः पुत्रदारादिवक्त्रालोकनजं सुखम् ॥३०१॥ अपरेणेति तत्रोक्तं व्रजामो विह्वला वयम् । नहि किंचिदकर्तव्यं विद्यतेऽस्माकमार्तितः ॥३०२॥ नाथेन तु विनायातान्निरीक्ष्य भरतो रुषा। मारयिष्यति नोऽवश्यं देशान् वापहरिष्यति ॥३०३॥ नाभेयो वा पुनर्यस्मिन् काले राज्यं प्रपत्स्यते । तदास्य दर्शयिष्यामो निस्त्रपाः कथमाननम् ॥३०४॥ तस्मादत्रैव तिष्ठामो भक्षयन्तः फलादिकम् । सेवामस्यैव कुर्वाणा भ्राम्यन्तः सुखमिच्छया ॥३०५॥ प्रतिमास्थस्य तस्याथ नमिश्च विनमिस्तथा । तस्थतुः पादयोनत्वा मोगयाचनतत्परौ ॥३०६॥ "याचमानौ विदित्वा तावासनस्य प्रकम्पनात् । आयातो धरणो नाम्ना नागराजस्वरान्धितः ।।३०७।। विकृत्य जिनरूपं स ताभ्यां विद्ये वरे ददौ । प्राप्य विद्य वरे यातौ विजयार्द्धनगे क्षणात् ॥३०८॥ योजनानि दशारुह्य तत्र विद्याभृदालयाः । नानादेशपुराकीर्णामोगैर्मोगक्षितेः समाः ॥३०९॥ लिये, कितने ही लोगोंने वृक्षोंके वल्कल धारण कर लिये, कितने ही लोगोंने चमड़ेसे शरीर आच्छादित कर लिया और कितने ही लोगोंने पहले छोड़े हुए वस्त्र ही फिरसे ग्रहण कर लिये ॥२९६|| अपने नग्न वेषसे लज्जित होकर कितने ही लोगोंने कुशाओंका वस्त्र धारण किया। इस प्रकार पत्र आदि धारण करनेके बाद वे सब फलों तथा शीतल जलसे तृप्तिको प्राप्त हुए ।।२९७।। तदनन्तर जिनकी बुरी हालत हो रही थी ऐसे भ्रष्ट हुए सब राजा लोग एकत्रित हो दूर जाकर निःशंक भावसे परस्परमें सलाह करने लगे ।।२९८।। उनमेंसे किसी राजाने अन्य राजाओंको सम्बोधित करते हुए कहा कि आप लोगोंमेंसे किसीसे भगवान्ने कुछ कहा था ॥२९९|| इसके उत्तरमें अन्य राजाओंने कहा कि इन्होंने हम लोगोंमें-से किसीसे कुछ भी नहीं कहा है । यह सुनकर भोगोंकी अभिलाषा रखनेवाले किसी राजाने कहा कि तो फिर यहाँ रुकनेसे क्या लाभ है ? उठिए, हम लोग अपने-अपने देश चलें और पुत्र तथा स्त्री आदिका मुख देखनेसे उत्पन्न हुआ सुख प्राप्त करें ॥३००-३०१|| उन्हींमें से किसीने कहा कि चूंकि हम लोग दुःखी हैं अतः चलनेके लिए तैयार हैं। इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे दुःखके कारण हम कर न सकें परन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि हम लोगोंको स्वामीके विना अकेला ही वापिस आया देखकर भरत मारेगा और अवश्य ही हम लोगोंके देश छीन लेगा ॥३०२-३०३।। अथवा भगवान् ऋषभदेव जब फिरसे राज्य प्राप्त करेंगे--वनवास छोड़कर पुनः राज्य करने लगेंगे तब हम लोग निर्लज्ज होकर इन्हें मुख कैसे दिखावेंगे? ॥३०४। इसलिए हम लोग फलादिका भक्षण करते हुए यहीं पर रहें और इच्छानुसार सुखपूर्वक भ्रमण करते हुए इन्हींकी सेवा करते रहें ॥३०५।। ___ अथानन्तर-भगवान् ऋषभदेव प्रतिमायोगसे विराजमान थे कि भोगोंकी याचना करने में तत्पर नमि और विनमि उनके चरणोंमें नमस्कार कर वहीं पर खड़े हो गये ॥३०६|| उसी समय आसनके कम्पायमान होनेसे नागकुमारोंके अधिपति धरणेन्द्रने यह जान लिया कि नमि और विनमि भगवान्से याचना कर रहे हैं। यह जानते ही वह शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचा ।।३०७।। धरणेन्द्रने विक्रियासे भगवान्का रूप धरकर नमि और विनमिके लिए दो उत्कृष्ट विद्याएँ दीं। उन विद्याओंको पाकर वे दोनों उसी समय विजयार्द्ध पर्वतपर चले गये ॥३०८॥ समान भूमि१. प्राप्यामीभिः म.। २. कृत्वा म.। ३. भगवता। ४. तस्थुतः म.। ५. याच्यमानी म., क. । ६.-क्षितः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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