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________________ राग, द्वेष, भय से रहित है ब्राह्मण मुल्ला के ये वचन सुनकर मौलवी को भरोसा तो न आया कि वह पांच रुपये दान करेगा, लेकिन उसने सोचा दुख में आदमी कभी-कभी कर भी देता है। दुख में कभी-कभी धर्म और परमात्मा स्मरण भी आ जाता है। और फिर कौन जाने दुख में कभी आदमी बदल भी जाता है। मौलवी ने प्रार्थना की। संयोग की बात. मल्ला बच भी गया। बच जाने के बाद. स्वस्थ हो जाने के बाद. मौलवी ने कई दफा कोशिश की और उसके घर का दरवाजा खटखटाया। लेकिन उसने खबर दे रखी थी अपने लड़कों को, पत्नी को, सबको कि जब भी मौलवी दिखे तो उसे फौरन कह देना कि मल्ला घर में नहीं है। दो महीने मौलवी चक्कर काटता रहा मस्जिद के उन पांच रुपयों के लिए। आखिर एक दिन उसने बाजार में पकड़ ही लिया कि नसरुद्दीन, रुको ! हद्द कर दी ! बीमारी से बच भी गये, प्रार्थना स्वीकृत भी हो गयी, पांच रुपयों का क्या हुआ? नसरुद्दीन ने कहा, 'कैसा पांच रुपया? क्या मैं इतना ज्यादा बीमार था कि पांच रुपया बोल गया दान? मैं होश में न रहा होऊंगा। इससे तुम समझ सकते हो! नसरुद्दीन ने कहा, कि मैं कितना बीमार था! आदमी दुख के क्षण में कभी घबड़ा जाता है, तो भीतर सोचता भी है । लेकिन उसका सोचना क्षणभर का होता है; सुख का क्षण आया कि फिर बाहर बहने लगता है। भीतर भी कुछ है, इसका हमें पता ही नहीं चल पाता। और भीतर ही सब कुछ है। सोना भीतर है,खजाना भीतर है, और हम भिक्षापात्र लिए बाहर मांगते रहते हैं। मरते वक्त भिक्षापात्र ही हाथ में होता है, खाली । होगा ही, क्योंकि सोना बाहर नहीं है। बाहर का सोना जुटाने में जो लगे हैं, उनसे ज्यादा नासमझ कोई दूसरा नहीं हो सकता, क्योंकि इसी समय का उपयोग भीतर के सोने को खोदने में हो सकता था। वहां अनंत खान है। जिसे हम आत्मा कहते हैं, वह भीतरी सोने की खदान है। लेकिन उस तरफ हमारे हाथ नहीं पहुंच पाते। __ महावीर कहते हैं कि जो भीतर के सोने की खोज में लग जाये, वह ब्राह्मण है। न केवल खोज में लगे, बल्कि भीतर के सोने को खोजकर अग्नि में शुद्ध करे। अग्नि यानी तप, अग्नि यानी साधना, तपश्चर्या, योग, तंत्र-जो भी हम नाम देना चाहें।। ___ अग्नि का अर्थ है कि भीतर अपने को तपाए । आप अपने को कभी तपाते हैं किसी भी क्षण में? कभी भीतर अपने को तपाते हैं किसी क्षण में? आप हमेशा कमजोरी की तरफ झुक जाते हैं। आप कभी सबल होने की तरफ नहीं झुकते । क्रोध उठा-यह बिलकुल स्वाभाविक, सहज है कि आप क्रोध प्रकट करते हैं, पशु भी कर रहे हैं। कुछ खास नहीं। कुछ क्रोध करके आप खास हो नहीं जायेंगे। पाशविक वृत्ति है लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह जो निर्बल धारा है कि क्रोध उठा, बाहर शरीर से ऊर्जा जा रही है ? रुक जाऊं, क्रोध को बैठ जाने दूं भीतर । दबाऊं भी नहीं, क्योंकि दबाने से जहर बन जायेगा। निकालूं भी नहीं, क्योंकि निकालने से दूसरे पर जहर चला जायेगा। सिर्फ साक्षी-भाव से देखता रहूं कि क्रोध उठा है, और कोई प्रतिक्रिया न करूं। ___ आप अग्नि से गुजर रहे हैं। क्रोध अग्नि बन जायेगी, लपट बन जायेगी। और अगर आप बिना कुछ किये इस लपट को देखते रहे, बिना कुछ किये...कोई निर्णय नहीं लेना । न तो यह कहना कि यह बुरा है, क्योंकि बुरा कहा कि दबाना शुरू हो गया, तो खुद के शरीर में जहर फैल जायेगा। अगर कहा कि बिलकुल ठीक है, स्वाभाविक है; दुनिया में सभी क्रोध करते हैं, मैं क्यों न करूं, और किया, तो दूसरे के शरीर पर जहर पहुंच गया। और क्रोध अगर किया तो और क्रोध को करने का द्वार खुल गया। आदत निर्मित हुई। कल और जल्दी क्रोध आ जायेगा । परसों और जल्दी क्रोध आ जायेगा। धीरे-धीरे क्रोध जीवन हो जायेगा। ___ लेकिन अगर न अपने क्रोध को दबाया और न क्रोध को प्रगट किया, बल्कि चेतना को संभाला और क्रोध को देखा, कोई निर्णय न लिया कि अच्छा या बुरा, करूं या न करूं, सिर्फ देखा कि क्या है क्रोध, तो आप एक अग्नि से गुजर रहे हैं । जो आग दूसरे को जलाती, 349 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001821
Book TitleMahavira Vani Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1998
Total Pages596
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size12 MB
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