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________________ १९० लब्धिसार सं० टी०-अनिवृत्तिकरणप्रथमसमये अन्यान्येव स्थितिखण्डस्थितिबन्धापसरणानुभागखण्डान्यपूर्वकरणचरमसमयसम्भवविलक्षणानि प्रारभते । चारित्रमोहोपशमकस्तत्रैव सर्वकर्मणामुपशमनिधत्तिनिकाचनकरणानिविनष्टानि । अपुवकरणेत्ति दसकरणा इति व्युच्छित्तिनियमकथनादनिवृत्तिकरणप्रथमसमयादारभ्य सर्वकर्माण्य दये संक्रमोदययोरुत्कर्षणापकर्षणसंक्रमोदयेष च निक्षेप्तुं शक्यानि जातानीत्यर्थः ॥ २२६ ॥ अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें होनेवाले कार्योंका निर्देश सं० चं०–अनिवृत्तिकरणका प्रथम समयविषै अपूर्वकरणका अन्त समय सम्बन्धीतैं और ही प्रमाण धरै स्थितिखण्ड स्थितिबन्धापसरण अनुभागखण्ड प्रारम्भिए है। बहुरि तहाँ ही सर्वकर्मनिका उपशम निघत्ति निकाचन इनि तीनि करणनिकी व्युच्छित्ति भई । उदयविर्षे प्राप्त करनेकौं अयोग्य सो उपशम कहिए । अर संक्रमण उदयविष प्राप्त करनेकौं अयोग्य सो निधत्ति कहिए । उत्कर्षण अपकर्षण संक्रमण उदयविषै प्राप्त करनेकौ अयोग्य सो निकाचना कहिए सो इहां सर्वकर्मनिको उदयादिविष निक्षेपण करनेकौ समर्थपना पाइए है ऐसा जानना ॥ २२६ ॥ विशेष-प्रकृत गाथाकी टीकामें गोम्मटसार कर्मकाण्डकी 'संकमकरणूणा' इत्यादि गाथा ४४१ का 'अपुवकरणेत्ति दसकरणा' इस प्रकार अन्तिम पाद उद्धृत किया है। सो ठीक ही है कि अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें अप्रशस्त उपशमकरण, निधत्तीकरण और निकाचनकरणकी व्युच्छित्ति हो जाती है। जो कर्म अपकर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रमके योग्य होकर भी उदोरणाके अयोग्य होकर उदयस्थितिमें अपकर्षित होनेके अयोग्य होता है उसकी अप्रशस्त उपशमकरण संज्ञा है। जो कर्म अपकर्षण और उत्कर्षणके योग्य होकर भी उदय और परप्रकृतिसंक्रमरूप न हों उन्हें निधत्तीकरण कहते हैं तथा जो कर्म इन चारोंके अयोग्य होकर तदवस्थ रहते हैं उनको निकाचनकरण कहते है । ये तीन उक्त करण हैं। इनकी यहाँ व्युच्छित्ति हो जानेसे जो कर्म इन तीनों करणरूप थे उन कर्मोका अब अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयसे उदीरणा उत्कर्षण, अपकर्षण और परप्रकृतिसंक्रम होने लगता है। शेष कथन सुगम है। अथ तस्मिन्नेवानिवृत्तिकरणप्रथमसमये कर्मणां स्थितिसत्त्वबन्धप्रमाणनिर्देशार्थमिदमाह अंतोकोडाकोडी अंतोकोडी य सत्त बंधं च । सत्तण्डं पयडीणं अणियट्टीकरणपढमम्हि ।। २२७ ।। अन्तःकोटीकोटिः अन्तःकोटिश्च सत्त्वं बंधश्च । सप्तानां प्रकृतीनां अनिवृत्तिकरणप्रथमे ॥ २२७ ॥ सं० टी०-अनिवृत्तिकरणप्रथमसमये आयुर्वजितसप्तकर्मणां स्थितिसत्त्वमन्तःकोटीकोटिप्रमितं सा अंको २ स्थितिबन्धश्चान्तःकोटिप्रमितः सा अं को १ । अपूर्वकरणकालकृतस्थितिखण्डस्थितिबन्धापसरण संख्यातसहस्रमाहात्म्यात् ॥ २२७ ।। १. आउगवज्जाणं कम्माणं द्विदिसंतकम्ममंतोकोडाकोडीए । ट्ठिदिबंधोध अंतोकोडाकोडीए तदसहस्सपुधत्तं बंधो । वही पृ० २३१-१३२ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001606
Book TitleLabdhisar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1980
Total Pages744
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Karma, & Samyaktva
File Size15 MB
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