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________________ ४४ लब्धिसारं एक आवलिप्रमाण द्रव्यको अतिस्थापित कर उसके नीचे उदय समय तक एक समय दो आवलि कम सत्तर कोड़ा-कोड़ी सागरोपमप्रमाण निषकोंमें उसका निक्षेप करने पर उक्त प्रमाण निक्षेप प्राप्त होता है। इसी प्रकार अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिके अनुसार सर्वत्र यथासम्भव उत्कृष्ट निक्षेप घटित कर लेना चाहिए ।। ५८ ।। व्याघातविषयक उत्कृष्ट अतिस्थापना और उत्कृष्ट निक्षेपका स्पष्टीकरण उक्कस्सद्विदि बंधिय मुहुत्तअंतेण सुज्झमाणेण । इगिकडएण घादे तम्हि य चरिमस्स फालिस्स ॥५१॥ चरिमणिसेयोक्कड्डे जेट्ठ मदित्थावणं इदं होदि । समयजुदंतोकोडाकोडिं विणुक्कस्सकम्मठिदी ॥६०।। उत्कृष्टस्थिति बंधयित्वा मुहूर्तान्तः शुद्धचता। एककांडकेन घाते तस्मिन् च चरमस्य फालेः ॥५९॥ चरमनिषेकापकर्षे ज्येष्ठमतिस्थापनमिदं भवति । समययुतान्तःकोटोकोटि विना उत्कृष्ट कर्मस्थितिः ॥६०॥ सं० टी०-केनचिज्जीवन कर्मोत्कृष्टस्थिति बद्ध्वा क्षयोपशमलब्धिमहिम्ना विशुध्यता बंधावलिमतिवाह्यांतर्मुहर्तेनैक कांडकघाते प्रतिसमयमसंख्येय गुणितफाल्यपनयने क्रियमाणे तस्मिश्चरमफाल्याश्चरमनिषके अपकव्याधोनिक्षिप्यमाणे समययुतांत.कोटीकोटिरहितकोत्कृष्टस्थितियाघातविषयापकपणे उत्कृष्टातिस्थापनं भवति, उपरिमचरमनिषेकसमयः अधोनिक्षेपस्थितिरतःकोटीकोटी च कर्मोत्कृष्टस्थितौ वर्जनीये। ततः समययुतांत:कोटीकोटिरहिता कर्मोत्कृष्टस्थितियाघातविषये उत्कृष्टमतिस्थापनमिति सिद्धं ॥५९-६०॥ स० चं०-अब जहाँ स्थितिकांडकघात होइ सो व्याघात कहिए। तहाँ कहिए है कोई जीव उत्कृष्ट स्थिति बांधि पीछे क्षयोपशम लब्धिकरि विशुद्ध भया तब बंधी थी जो स्थिति तीहिविर्षे आबाधारूप बंधावलीकौं व्यतीत भएं पीछे एक अंतर्मुहूर्त कालकरि स्थितिकांडकका घात कोया तहाँ जो उत्कृष्ट स्थिति बांधो थी तिसविर्षे अन्तःकोटाकोटी सागरप्रमाण स्थिति अवशेष राखि अन्य सर्व स्थितिका घात तिस कांडककरि हो है । तहाँ कांडकवि जेती स्थिति घटाई ताके सर्व निषेकनिका परमाण निकौं समय समय प्रति असंख्यातगणा क्रम लीए अवशेष राखो स्थितिविर्षे पर्यंत निक्षेपण करिए है । सो समय समयविष जो द्रव्य निक्षेपण कीया सोई फालि है। तहां अंतको फालिविर्षे स्थितिके अन्त निषेकका जो द्रव्य ताकौं ग्रहि अवशेष राखी स्थितिविर्ष दीया तहाँ एक समय अधिक अंतःकोटाकोटी सागरकरि हीन उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण उत्कृष्ट अति १. बाधादेण अइच्छावणा एक्का, जेणावलिया अदिरित्ता होइ ! तं जहा-दिदिधादं करेंतेण खंडयमागाइदं । तत्थ जं पढमसमए उक्की रदि पदेसग्ग तस्स पदेसग्गस्स आवलियाए अइच्छावणा। एवं जाव दुचरिमसमयअणुविकण्णखंडगं ति । चरिमसमए जा खंडयस्स अग्गा8दी तिस्से अइच्छावणा खंडयं समयूणं। क० चू०, जयध० भाग ८, पृ० २४८-२४९ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001606
Book TitleLabdhisar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1980
Total Pages744
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Karma, & Samyaktva
File Size15 MB
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