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________________ प्रस्तावना एषो मे सासदो आवा णाणसणलपवणो । सेसा मे बाहिरा भावा सम्वे संजोगलक्षणा ॥ -समयप्राभूत एकोऽहं निर्भगः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः । बाह्याः संयोगजाः भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥27॥ ---इष्टोपदेश रतो बंधति कम्मं मुंचदि कम्मं विरागसंपत्तो । एसो जिणोवएसो तम्हा कम्मेप्तु मा रज्ज ॥ -समयप्राभूत बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्मप्र: क्रमात् । तस्मात सर्वप्रयत्लेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥26॥ -इष्टोपदेश रत्नकरण्डक एक श्लोक आता है जिसमें कहा गया है कि धर्म के प्रभावसे कूकर भी देव हो जाता है और अधर्मके प्रभावसे देवको भी कूकर होते देर नहीं लगती । यथा-- इवापि देवोऽपि वेवः वा जायते घसंकिल्विषात् । कापि नाम भवेवग्या संपद् धर्माच्छरीरिणाम् ॥ 1, 29॥ इष्टोपदेश में यही शब्द तो नहीं हैं पर इनका अनुसरण करते हुए आचार्यवर्य कहते हैं. वरं व्रतः पदं वं वाव्रतवंत नारकम् । छायातपस्थयो नः प्रतिपालयतोमहान् ।। 3॥ साधकके लिए आत्मसाधनामें इससे बड़ी सहायता मिलती है। 4. दशभक्ति-भक्तियाँ दशसे अधिक हैं। फिर भी वे भुख्यरूपसे दस मानी जाती हैं। श्रीमान् पं० पन्नालालजी सोनीने सम्पादित कर क्रियाकलाप' नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया है। यह संग्रह ग्रन्थ है। इसके प्रथम अध्यायके कुछ प्रकरणोंका संग्रह स्वयं पण्डितजीने किया है। शेप संग्रह मालूम होता है प्राचीन है। सम्भव है इसके संग्रहकार पण्डित प्रभाचन्द्र हों। इन्होंने ही इसके अनेक उपयोगी विषयों पर टीका लिखी है। ये पण्डित थे और इनका नाम प्रभाचन्द्र था-इसकी सूचना नन्दीश्वर-भक्तिके अन्त मे प्रकरण समाप्तिकी पुष्पिका लिखते समय स्वयं इन्होंने दी है !- इसमें सब भक्तियों व दूसरे प्रकरणोंका संग्रह स्वयं इनका किया दुआ है या क्रियाकलापको जो वर्तमान स्वरूप मिला है वह बादका काम है यह हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते, क्योंकि एक तो न स्वयं सोनीजीने इसकी व्यवस्थित सूचना दी। सोनीजी यदि इसकी प्रस्तावनामें यह बतलानेकी कृपा करते कि उन्होंने जितनी प्रतियोंके आधारसे इसका सम्पादन किया है, वे कहाँकी हैं और उनका लेखन-काल क्या है तो इस बातके निर्णय करने में बड़ी सहायता मिलती कि यह संग्रह कितना पुराना है। दूसरे इस में ऐसे कई उपयोगी विषयोंका संग्रह है किन्तु उन पर पण्डित प्रभाचन्द्रकी टीका न होनेते वे उनके सामने थे इस बातको स्वीकार करने में संकोच होता है। उदाहरणार्थ प्राकृतनिर्वाणभक्ति जो लोकमें निर्वाणकाण्डके नाम से प्रसिद्ध है, इसमें संग्रहीत है पर इस पर उनकी टीका नहीं है। जब कि वह दूसरी भक्तियोंके मध्य में स्थित है। सोनीजीने मुद्रित क्रियाकलापके सम्बन्ध में अपनी भूमिका में स्थिति स्पष्ट तो की है पर उससे पूरा प्रकाश नहीं पड़ता। इसमें जितनी भक्तियां संग्रहीत हैं उनमेंसे प्रथम परिच्छेदमें सिद्धिभक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात भक्तियां संग्रहीत हैं। इनमें से नन्दीश्वर 1. देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पु० 21 2. 'इति पण्डितप्रभाचन्द्रविरचितायां क्रियाकलापटीकायां भक्तिविवरण: प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः।' 3. इतना अवश्य है कि इसके 'दैवसिकरात्रिकप्रतिक्रमण' नामक प्रकरणके अन्त में एक लेख उपलब्ध होता है जिसमें 1724 सं० अंकित है। अतएव इससे पूर्वका यह संग्रह है यह कहा जा सकता है। देखो क्रियाकलाप, प्रस्तावना पृ० 69 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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