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________________ 18 सर्वार्थ सिद्धि जिन्होंने लक्षणशास्त्रकी रचना की, मैं उन आचार्य पूज्यपादको प्रणाम करता है। उनके इस लक्षणशास्त्रकी महत्ता इसीसे स्पष्ट है कि जो इसमें है वही अन्यत्र है और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है। उनकी और उनके साहित्यकी यह स्तुति परम्परा यहीं समान नहीं होती। धनंजय, वादिराण, भट्टारक शुभचन्द्र और पद्मप्रभ आदि अनेक ऐसे आचार्य हुए हैं जो इस मुणग थाकी परम्पराको बोषित रखने के लिए अपने पूर्ववर्ती आचार्योंके पदचिह्नों पर चले हैं। अभिप्राय यह है कि आचार्य पूज्यवाद साहित्य-जगत् में कभी न अस्त होनेवाले वे प्रकाशमान सूर्य थे जिसके आसोकसे दशों दिशाएँ सदा आलोकित होती रहेंगी। ये हैं वे तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तुत वृत्ति सर्वार्थसिद्धिके रचयिता आचार्य पूज्यपाद जिनका सर्वांग परिचय हमें यहाँ प्राप्त करना है। उसमें भी उनका पूरा नाम क्या है, वे किस संघ के अधिपति थे। उनका जीवन परिचय क्या है, उनकी रचनाएँ कौन-कौन हैं और उनका वास्तव्य काम व गुरु-शिष्य परम्परा क्या है आदि विषय विचारणीय हैं जिनका यहाँ हम क्रमश: परिचय प्राप्त करनेका उपक्रम करेंगे। सर्वप्रथम नामको ही लीजिए 2.माम-शिलालेखों तथा दूसरे प्रमाणोंसे विदित होता है कि इनका गुरुके द्वारा दिया हुआ दीक्षानाम देवनन्दि था, बुद्धिकी प्रखरताके कारण इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि कहते थे और देवोंके द्वारा इनके चरण युगल पूजे गये थे इसलिए वे पूज्यपाद इस नामसे भी लोक में प्रख्यात थे। इस अर्थको व्यक्त करनेवाले उद्धरण ये हैं प्रागभ्यधायि गुरुणा किल वनन्दी बुद्धया पुनविपुलया स मिनेन्द्रबुद्धिः । श्रीपूज्यपाद इति चष बुषैः प्रचल्ये सत्यमिता पवयुगे वनदेवताभिः । श्रवणबेलगोला शि० नं0 105, वि० सं० 13201 टनके पूज्यपाद और जिनेन्द्रबुद्धि इन नामोंकी सार्थकताको व्यक्त करनेवाले वहीं के नं0 108 के एक दुसरे शिलालेखको देखिए श्रीपादोदक्षतधर्मराज्यस्ततः सुराबीश्वरपूज्यपादः । यदीयदृष्यगुणानिवानी बदन्ति शास्त्राणि तदषतानि ॥ पुतविश्वबुद्धिरयमत्र योगिभिः कृतकृत्यभावमनविभ्रयुच्चकैः । जिनयद बभूव यवनङ्गचापहृत्स जिनेन्द्रबुसिरिति सावर्णितः ॥ ये दोनों श्लोक वि० सं० 1355 के शिलालेख के हैं। इनमें कहा गया है कि आचार्य पूज्यपादने धर्मराज्यका उद्धार किया था, इससे आपके चरण इन्द्रों द्वारा पूजे गये थे। इनके पूज्यपाद इस नाम से सम्बोधित किये जानेका यही कारण है। इनमें वैदुष्य आदि अनेक गुण थे जिनका स्थापन आज भी इनके द्वारा रचे गए प्रास्त्र कर रहे हैं। ये जिन देव के समान विश्वबुद्धि के धारक थे, कृतकृत्य थे और कामदेवको जीतने वाले थे, इसलिए योगी जन इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि इस नामसे सम्बोधित करते थे। शिलालेखों में त अन्यत्र और भी ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं जिनसे इनके तीन नामोंकी सार्थकतार । आदिपुर . नद्धरण हम पहले दे आये हैं। उनके तथा वादि। सूरिके एक उल्लेखसे विदित 1. श्रवणवेल्गोलके एक • 1085 के शिलालेख (जो इससे पूर्ववर्ती है) से भी इस तथ्यका समर्थन होता है। 2. देखो श्रवणबेलगोल शिलालेख नं0 50 और नन्दिसंघ की पट्टावली। 3. पार्श्वनाथचरित सर्ग 1, श्लोक 181 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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