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________________ परिशिष्ट 2 [407 अन्तर्महतं यावत् सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते। पुनर- . 110 परां षट्पष्टों वेदकसम्यक्त्वेन तिष्ठति । अन्त्यसागरोपमावसानशेषे मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति देशोने । 48.4 तिर्यगमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि सासादनकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः। पल्योपमान्यन्तरम् । अधिकमपि कस्मान्नेति चेत्, अन्तर्महतः कस्मान्नेति च न चोद्यम, अन्तर्महर्तमध्ये वेदकयुक्तस्य तिर्यक्षुत्पादाभावात् तद्य क्तो हि पुनः सासादनगुणग्रहणे योग्यतासंभवात् । परित्यक्तौ देवेष्वेवोत्पद्यते । अतो मिथ्यात्वयुवतस्त्रिपल्योपमापशमिकसम्यक्त्वो हि मिथ्यात्वप्राप्त्यन्तराले वर्तमानः युष्को भोगभूमिपूत्पद्यते । तत्र चोत्पन्नानां तिर्यग्मसासादनोऽभिधीयते। तस्य च मिथ्यात्वं गतस्य नुष्याणां किंचिदधिकाष्टचत्वारिंशदिनेषु सम्यक्त्वपुनरौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणे योग्यता पल्योपमासंख्येय- ग्रहणयोग्यता भवतीति नियमादेतावद्दिनेषु गतेषु भागे सत्येव नावान्तरे तत्र वेदकग्रहणयोग्यताया एव मिथ्यात्वपरित्यागेन सम्यक्त्वं गह्णातीति त्रिपल्योपसंभवात् । मायुशेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति गर्भकालेन किंचिदधिकाष्टचत्वारिंशद्दिनरचसानकालशेषेण च हीनत्वाद्देशोनानि । . [आगे अन्तरका कथन करते हैं। मिथ्यादष्टि एक जीवके प्रति अन्तरकाल उत्कर्षसे दो छियासठ सागर [तिर्यचमिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे तीन है जो इस प्रकार है-वेदकसम्यक्त्वसे युक्त जीव । पल्योपम अन्तरकाल है। एक छियासठसागर तक रहता हैं क्योंकि वेदक शंका-अधिक क्यों नहीं है ? सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थिति इतनी ही है। उसके उत्तर--क्योंकि वेदक सम्यक्त्वसे युक्त जीव तिर्यंचोंमें 'पश्चात् एक अन्तर्मुहुर्तके लिए सम्यमिथ्यात्व गुणस्थानको प्राप्त करता है । पुनः दूसरे छियासठ उत्पन्न नहीं होता, देवोंमें ही उत्पन्न होता है । अत: सागर तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहता है । अन्तिम तीन पल्यकी आयका बन्ध करनेवाला मिथ्यादृष्टि सागरके अन्त में कुछ काल शेष रहनेपर मिथ्यात्वमें भोगभूमि में उत्पन्न होता है। भोगभूमिमें उत्पन्न चला जाता है । इस प्रकार देशोन दो छियासठ सागर हुए तियच आर मनुष्याम कुछ अधिक अड़त अन्तरकाल होता है। सासादन एक जीवके प्रति दिन बीतने पर सम्यक्त्वग्रहणकी योग्यता आती है अन्तरकाल जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग है। ऐसा नियम है । अतः इतने दिन बीतने पर वह मिथ्यात्वको त्याग कर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है शंका-अन्तर्मुहूर्त अन्तरकाल क्यों नहीं है ? और तीन पल्य की आयु में कुछ शेष रहने पर पुनः उत्तर-ऐसा तर्क नहीं करना चाहिए, क्योंकि अन्त- मिथ्यात्वको ग्रहण कर लेता है। इस तरह गर्भकाल मुहर्तकालके अन्दर पुनः सासादनगुणस्थान को ग्रहण से किचित् अधिक अड़तालीस दिनों और अन्तिमकरने की योग्यता सम्भव नहीं है। इसका कारण कालसे हीन होनेसे देशोन तीन पल्य अन्तरकाल यह है कि जो जीव औपशमिक सम्यक्त्वको छोड़कर होता है। मिथ्यात्व गुणस्थान प्राप्तिके बीचके समयमें रहता ६. 111 है उसे सासादन कहते हैं। उसके मिथ्यात्वमें चले। जानेपर पूनः औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी 49.6 मनुष्यगतौ सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यायोग्यता पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल बीतनेपर दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टयः पूर्वकोटिपृथक्त्वकाले सति ही मानी है उससे पहले नहीं। उससे पहले वेदक स्वस्वगुणं परित्यज्य भोगभूमावुत्पद्यन्ते । पश्चात् सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता ही सम्भव स्वगुणं गृहन्ति । एकमेव जीवं प्रति उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वाधिकानि भवन्ति । 1. धवला पु. 5, पृ०.७ में प्रथम छियासठ सागरमें अन्तर्महत काल शेष रहने पर ही सम्यक् मिथ्यात्वको प्राप्त कराया है ।---सं० । 2. धवला पु.5, पृ० 32 में आदिके महर्तपृथक्त्वसे अधिक दो मास और आय के अवसानमें उपलब्ध दो अन्तर्मुहौसे हीन तीन पल्योपम अन्तरकाल कहा है ।-सं० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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