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________________ प्रस्तावना 39 'साम्प्रदायिक अभिनिवेश बढ़ जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी थी जब कि तत्त्वार्थभाष्य में ऐसे अभिनिवेशका सर्वथा अभाव है।' __ यह तो हम पहले ही बतला आये हैं कि जैन परम्परा में साधुओंने वस्त्र और पात्र किस परिस्थिति में स्वीकार किये थे और यह भी उल्लेख कर आये हैं कि श्वेताम्बर अंगश्रुतकी रचना पाँचवीं शताब्दी के वाद हई है। अतएव यह भी सुनिश्चित है कि तत्त्वार्थभाष्य उसके बाद ही किसी समय लिखा गया होगा, क्योंकि पण्डितजीके ही शब्दोंमें उन्होंने (तत्त्वार्थभाष्यकारने) तत्त्वार्थकी रचनाके आधाररूप जिस अंग अनंगश्रुतका अवलम्बन किया था वह पूर्णतया स्थविरपक्षको मान्य था।' इस अभिप्रायसे उक्त कथनकी पुष्टि होती है । __ साधारणत: यह मतभेद श्वेताम्बरीय अंगश्रुतके पुस्तकारूढ़ हो जानेके बाद ही उग्ररूप में प्रकट होने लगा था; क्योंकि जैन परम्पराके कहे जानेवाले अंगश्रुत जैसे महत्त्वपूर्ण साहित्य में सवस्त्र मुक्ति और स्त्रीमुक्ति जैसे विषयका समावेश होना पुरानी परम्पराको ही नष्ट-भ्रष्ट करनेवाली घटना थी। इस काल में एक ओर जहाँ साम्प्रदायिक अभिनिवेश में आकर उक्त बातोंका विधान किया जाने लगा था वहाँ दूसरी ओर तात्त्विकदृष्टि से उसका निषेध करना और दर्शनमोहनीयके बन्धका कारण बतलाना अनिवार्य हो गया था। सर्वार्थसिद्धिकारने यह कार्य किया है और दृढ़ताके साथ किया है। वस्तुत: उस कालमें तात्त्विक पक्षकी रक्षाका भार उनपर था और उन्होंने उसका सुन्दरतापूर्वक निर्वाह भी किया है। ऐसी अवस्था में हमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार अन्य प्रमाणोंके आधारसे करना चाहिए। शैलीभेद, अर्थविकास और साम्प्रदायिकताके आधारसे इसका निर्णय करना गौण है। अत: आइए, अन्य प्रमाणों के प्रकाश में इस तत्त्वका निर्णय किया जाय । ___इस समय तत्त्वार्थभाष्यपर मुख्यतया प्रथम दो टीकाएँ उपलब्ध होती हैं...--प्रथम हरिभद्रकी टीका और दूसरी सिद्ध सेनगणिकी टीका। आचार्य हरिभद्र और सिद्धसेनगणि समकालीन या कुछ आगे पीछेके होते हुए भी भट्ट अकलंक देवके बादमें हुए हैं। इतना ही नहीं सिद्ध सेनगणिने तो भट्ट अकलंक देवकी कृतियोंका भरपूर उपयोग भी किया है यह उनकी टीकाके देखनेसे भी विदित होता है। किन्तु प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी इस मतसे सहमत होते हुए भी दूर चले जाते हैं । वे तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० 96 में लिखते हैं किसी-किसी स्थलपर एक ही सूत्रके भाष्यका विवरण करते हुए वे पाँच-छह मतान्तर निर्दिष्ट करते हैं, इससे ऐसा अनुमान करनेका कारण मिलता है कि जब सिद्धसेनने वृत्ति रची तब उनके सामने कमसे कम तत्त्वार्थ सूत्रपर रची हुई पांच टीकाएं होनी चाहिए; जो सर्वार्थ सिद्धि आदि प्रसिद्ध दिगम्बरीय तीन व्याख्याओंसे पृथक् होंगी ऐसा मालूम पड़ता है; क्योंकि राजवार्तिक और श्लोकवातिककी रचनाके पहले ही सिद्धसेनीय वृत्तिका रचा जाना बहुत सम्भव है; कदाचित् उनसे पहले यह रची गयी हो तो भी इसकी रचनाके बीच में इतना तो कमसे कम अन्तर है ही कि सिद्धसेनको राजवातिक और श्लोकवातिकका परिचय मिलनेका प्रसंग ही न आया।' ___ यहाँ हमें सर्वप्रथम पण्डितजीके इस वक्तव्यको आलोचना करनी है और इसके बाद देखना है कि क्या सिद्धसेनगणिकी टीका राजवातिकका आलोडन किये बिना लिखी गयी थी। पण्डितजीने सर्वप्रथम सिद्धसेनगणिकी अध्याय पाँच सूत्र तीनकी टीकाके आधारसे तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी पाँच-छह स्वतन्त्र टीकाओंका अनुमान किया है इस आधारसे हम इसे ठीक मान लेते हैं । तथापि इससे यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है कि सिद्ध सेनगणिने तत्त्वार्थवातिकका आलोडन किये बिना ही अपनी टीका लिखी थी। इससे तो केवल इतना ही पता लगता है कि उनके सामने और भी कई टीकाएँ थीं जो नित्यावस्थितान्यरूपाणि' सूत्रके कई पाठ प्रस्तुत करती थीं। यह स्वतन्त्र विषय है और इसपर स्वतन्त्र 1. हरिभद्रकी टीका तीन लेखकोंने पूरी की है ऐसा प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० 95 में सूचित करते हैं और टीकाके देखनेसे यह मत समीचीन प्रतीत होता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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