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________________ 36 सर्वार्थसिद्धि स्पष्ट हो जाती है। तथापि कुछ अत्युपयोगी विषयोंपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है; क्योंकि अन्तमें हमें यह देखना है कि इनकी रचनाकी आनुपूर्वी क्या है। इस प्रकरणको विशेष स्फूट करनेके लिए सर्वप्रथम हम समान स्थलोंका ऊहापोह करेंगे और उसके बाद उन स्थलोंको स्पर्श करेंगे जिससे इनके पौर्वापर्य के ऊपर प्रकाश पड़ता है; क्योंकि सर्वप्रथम हमें यह दिखलाना है कि इन दोनों ग्रन्थों की स्थिति ऐसी है कि किसी एकको सामने रखकर दूसरा लिखा गया है और अन्त में यह विचार करना है कि यह अनुसरणकी प्रवृत्ति किसमें स्वीकार की गयी है। सर्वप्रथम प्रथम अध्यायका प्रथम सूत्र ही लीजिए। इसमें सर्वार्थसिद्धि में यह वाक्य आता है एतेषां स्वरूप लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्वेक्ष्यामः । यही वाक्य तत्त्वार्थभाष्यमें कुछ शब्दोंके हेर-फेरके साथ इन शब्दों द्वारा स्फूट किया गया है. तं पुरस्ताल्लक्षणतो विधानतश्व विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । आगे भी यह सादृश्य अन्त तक देखनेको मिलता है । यथा--- सर्वार्थसिद्धि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थश्च वक्ष्यमाणो जीवादिः 1.2। तत्त्वानि जीवादीनि वक्ष्यन्ते । 121 प्रशमसंवेगानुकंपास्तिक्याघभिव्यक्तिलक्षणं तदेवं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिप्रथमम् । 12।व्यक्तिलक्षणं तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शन मिति। 1.21 तत्त्वार्यश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । अथ कि तत्त्वमित्यत इदमाह--उत्थानिका 1,41 | तत्र कि तत्त्वमिति । अत्रोच्यते-उत्थानिका। 1,41 तद्यथा-नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो। तद्यथा-नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो भावजीव इति चतुर्धा जीवशब्दार्थो न्यस्यते 15। | भावजीव इति । 151 काष्ठपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिषु सोऽयमिति यः काष्ठपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिषु स्थाप्यमाना स्थापना। 1,51 | स्थाप्यते जीव इति स स्थापनाजीवः। 151 किंकृतोऽयं विशेषः ? वक्तृविशेषकृतः । किंकृत: प्रतिविशेष इति ? अत्रोच्यतेत्रयो वक्तारः सर्वज्ञस्तीर्थकर इतरो वा श्रुतके वली | वक्तृविशेषावै विध्यम् । यद्भगवद्भिः सर्वज्ञैः सर्वआरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमा- दशभिः परमर्षभिरहद्भिः तत्स्वाभाव्यात् परमशुभस्य चिन्यकेवलज्ञानविभूति विशेषेण अर्थत आगम च प्रवचनप्रतिष्ठापनफलस्य तीर्थकरनामकर्मणोऽनु। उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च | भावादुक्तं भगवच्छिष्यरतिशयद्भिरुत्तमातिशयवाग्बुप्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्यर्बुद्ध्यतिशयद्धियुक्तगण- |द्धिसंपन्नगणधरब्धं तदङ्गप्रविष्टम् । गणधरानन्तर्याधरैः श्रुतकेवलिभिरनुस्मृतग्रन्थरचनमङ्गपूर्वलक्षणम् । | दिभिस्त्वत्यंतविशुद्धोगमैः परमप्रकृष्टवाङ्मतिशक्ति तत्प्रमाणम्, तत्प्रामाण्यात् । आरातीयः पुनराचार्यैः | भिराचार्य: कालसंहननायुर्दोषादल्पशक्तीनां शिष्याणा कालदोष.त्संक्षिप्तायुर्मतिबलशिष्यानुग्रहार्थं दशवै- | मनुग्रहाय यत्प्रोक्तं तदङ्गबाह्यमिति । 120 । कालिकाद्युपनिबद्धम्। 1,20।। यहाँ हमने इस विषयको स्पष्ट करनेके लिए थोडेसे उदाहरण ही उद्धृत किए हैं । आगे उन स्थलोंको स्पर्श करना है जो सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यको स्पष्ट करनेमें सहायता करते हैं। प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीने सर्वार्थ सिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य इन मेंसे पहले कौन और बादमें कौन लिखा गया इसका विचार करते हुए शैलीभेद, अर्थविकास और साम्प्रदायिकता इन तीन उपप्रकरणों द्वारा इस विषयपर प्रकाश डाला है और इन आधारोंसे तत्त्वार्थभाष्यको प्रथम ठहरानेका प्रयत्न किया है। प्रज्ञाचक्ष पं० सुखलालजीके कथनानुसार हम मान लें कि सर्वार्थसिद्धिकी शैली तत्त्वार्थभाष्यकी शैलीकी अपेक्षा विशेष विकसित और विशेष परिशीलित है। साथ ही यह भी मान लें कि सर्वार्थ सिद्धि में व्याकरणकी दृष्टिसे अर्थविकासके स्पष्ट दर्शन होते हैं। तथापि इन आधारोंसे तत्त्वार्थभाष्यको पहलेकी और सर्वार्थसिद्धिको बादकी रचना घोषित करने का प्रयत्न करना संयुक्तिक प्रतीत नहीं होता। आचार्य पूज्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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