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________________ -8112 8757] अष्टमोऽध्यायः [307 $ 756. उक्तो नामकर्मण उत्तरप्रकृतिभेदः। तदनन्तरोद्देशभाजो गोत्रस्य प्रकृतिभेदो व्याख्यायते उच्चर्नीचैश्च ॥12॥ 8757. गोत्रं द्विविधम्-उच्चैर्गोत्रं नीचर्गोत्रमिति । यस्योदयाल्लोकपूजितेषु कुलेषु जन्म तदुच्चैर्गोत्रम् । यदुदयाद्हितेषु कुलेषु जन्म तन्नीचर्गोत्रम् । हैं और भवके अवस्थानके कारण भवविपाकी कर्म हैं। इस प्रकार कार्यभेदसे कर्मोको इन चार भागोंमें विभक्त किया गया है। वस्तुत: सभी कर्म जीवकी उस उस कर्मके नामानुरूप योग्यताके होने में सहायता करते हैं और उस उस योग्यतासे युक्त जीव तदनुरूप कार्य करता है। उदाहरणार्थ-औदारिक शरीर नामकर्मके उदयका निमित्त पाकर जीवमें ऐसी योग्यता उत्पन्न होती है जिससे वह योगद्वारा शरीर निर्माणके लिए औदारिक वर्गणाओंको ही ग्रहण करता है, अन्य वर्गणाओंको नहीं। वज्रर्षभनाराचसंहनन और समचतुरस्रसंस्थान नामकर्मके उदयका निमित्त पाकर जीवमें ऐसी योग्यता उत्पन्न होती है जिससे वह ग्रहण की गयी औदारिक वर्गणाओंको उस रूपसे परिणमाता है । प्रश्न यह है कि पुद्गलविपाकी कर्मोके उदयको निमित्त पाकर यदि जीवमें कर्मोंके नामानुरूप योग्यता उत्पन्न होती है तो फिर इन्हें पुद्गलविपाकी कर्म क्यों कहते हैं ? क्या ये कर्म जीवको माध्यम बनाकर ही अपना काम करते हैं ? इनका जो काम है वह यदि सीधा माना जाय तो क्या आपत्ति है ? उत्तर यह है कि जब तक जीवको औदारिक आदि नोकर्मवर्गणा का निमित्त नहीं मिलता है तब तक पुद्गलविपाकी कर्म अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होते हैं। इनका विपाक पुद्गलों का निमित्त पाकर होता है इसलिए इन्हें पुद्गलविपाकी कहते हैं । उदाहरणार्थ-कोई एक जीव दो मोड़ा लेकर यदि जन्म लेता है तो उसके प्रथम और द्वितीय विग्रहके समय शरीर आदि पुद्गल विपाकी प्रकृतियोंका उदय नहीं होता है। तीसरे समयमें जब वह नवीन शरीरको ग्रहण करता है तभी उसके इन प्रकृतियोंका उदय होता है। इस प्रकार विचार करनेसे ज्ञात होता है कि शरीर आदि नामकर्मकी प्रकृतियोंकी पुद्गलविपाकी संज्ञा क्यों है । इसी प्रकार भवविपाकी और क्षेत्रविपाकी प्रकृतियोंके सम्बन्धमें भी स्पष्ट जानना चाहिए। भवकी कारणभूत जो आयूकर्मकी प्रकृतियाँ हैं और जिनका उदय तत्तत् भव तक ही सीमित है इसीसे इनकी भवविपाकी संज्ञा है। क्षेत्रविपाकी प्रकृतियाँ मरणके बाद दूसरे भवके अन्तरालवर्ती क्षेत्रमें अपना काम करती हैं, इसलिए इनकी क्षेत्रविपाको संज्ञा है । यद्यपि बाह्य सुपुत्रादिके निमित्तसे सातादि जीवविपाकी प्रकृतियोंका भी उदय देखा जाता है पर ये बाह्यनिमित्त उनके उदयसे अविनाभावी कारण नहीं हैं। कदाचित् इन बाह्य निमित्तोंके रहते हुए भी उनसे प्रतिकूल प्रकृतियोंका उदय देखा जाता है और कदाचित इन निमित्तोंके अभाव में भी उनका उदय देखा जाता है, इसलिए बाह्य निमित्तोंकी प्रधानता न होनेसे सातादि प्रकृतियोंकी जीवविपाकी संज्ञा है। इस प्रकार सब कर्मप्रकृतियाँ कितने भागोंमें बटी हुई हैं और उनकी जीवविपाकी आदि संज्ञा होनेका क्या कारण है इसका विचार किया। 6756. नामकर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे । इसके बाद कहने योग्य गोत्रकर्म के प्रकृतिविकल्पोंका व्याख्यान करते हैं उच्चगोत्र और नीचगोत्र ये दो गोत्रकर्म हैं ॥12॥ 8757. गोत्रकर्म दो प्रकारका है-उच्चगोत्र और नीचगोत्र । जिसके उदयसे लोकपूजित कुलोंमें जन्म होता है वह उच्चगोत्र है । जिसके उदयसे गर्हित कुलोंमें जन्म होता है वह नीचगोत्र है। 1. जन्मकारणं तदु- आ., दि. 1, दि. 21 2. जन्मकारणं तन्नी-- आ. दि., 1, दि. 2 । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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