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________________ 252] सर्वार्थसिद्धी [61118 629वाचा च परप्रकाश्यज्ञानस्य वर्जनमासादनम् । प्रशस्तज्ञानदूषणमुपधातः । आसावनमेवेति चेत् ? सतो ज्ञानस्य विनयप्रदानादिगुणकीर्तनाननुष्ठानमासादनम् । उपघातस्तु ज्ञानमज्ञानमेवेति ज्ञाननाशाभिप्रायः । इत्यनयोरयं भेदः । 'तत्'शब्देन ज्ञानदर्शनयोः प्रतिनिर्देशः क्रियते। कथं पुनरप्रकृतयोरनिर्दिष्टयोस्तच्छब्देन परामर्शः कर्तुं शक्यः ? प्रश्नापेक्षया। ज्ञानदर्शनावरणयोः क आस्रव इति प्रश्ने कृते तदपेक्षया तच्छब्दो ज्ञानदर्शने प्रतिनिर्दिशति । एतेन ज्ञानदर्शनवत्सु तत्साधनेषु च प्रदोषादयो योज्याः; तन्निमित्तत्वात् । त एते ज्ञानदर्शनावरणयोरास्रवहेतवः। एककारणसाध्यस्य कार्यस्यानेकस्य दर्शनात तुल्येऽपि प्रदोषादौ ज्ञानर्शनावरणास्त्रवसिद्धिः। अथवा विषयभेदादास्रवभेदः । ज्ञानविषयाः प्रदोषादयो ज्ञानावरणस्य । दर्शनविषयाः प्रदोषादयो दर्शनावरणस्येति। 8629. यथानयोः कर्मप्रकृत्योरानवभेदास्तथा--- दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य ॥ 8630. पीडालक्षणः परिणामो दुःखम् । अनुग्राहकसंबन्धविच्छेदे वैक्लव्यविशेषः शोकः । परिवादादिनिमित्तादाविलान्तःकरणस्य तीव्रानुशयस्तापः । परितापजाताश्रुपातप्रचुरविप्रलापादिभिर्व्यक्तक्रन्दनमाक्रन्दनम् । आयुरिन्द्रियबलप्राणवियोगकरणं वधः । संक्लेशपरिणामावलम्बन वेने योग्य भी है तो जिस कारणसे वह नहीं दिया जाता है वह मात्सर्य है। ज्ञानका विच्छेद करना अन्तराय हैं । दूसरा कोई ज्ञानका प्रकाश कर रहा हो तब शरीर या वचनसे उसका निषेध करना आसादन है। प्रशंसनीय ज्ञानमें दूषण लगाना उपघात है । शंका–उपघातका जो लक्षण किया है उससे वह आसादन ही ज्ञात होता है ? समाधान-प्रशस्त ज्ञानकी विनय न करना, उसकी अच्छाईकी प्रशंसा न करना आदि आसादन है। परन्तु ज्ञानको अज्ञान समझकर ज्ञानके नाशका इरादा रखना उपघात है इस प्रकार इन दोनों में अन्तर है। सत्रमें 'तत्' पद ज्ञान और दर्शनका निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका–ज्ञान और दर्शन अप्रकृत हैं, तथा उनका निर्देश भी नहीं किया है, फिर यहाँ 'तत्'शब्दके द्वारा उनका ज्ञान कैसे हो सकता है ? समाधानप्रश्नैकी अपेक्षा अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरणका क्या आस्रव है ऐसा प्रश्न करनेपर उसकी अपेक्षा 'तत' शब्द ज्ञान और दर्शनका निर्देश करता है। इससे यह अभिप्राय निकला कि ज्ञान और दर्शनवालोंके विषयमें तथा उनके साधनोंके विषयमें प्रदोषादिककी योजना करनी चाहिए, क्योंकि ये उनके निमित्तसे होते हैं । ये प्रदोषादिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रवके कारण हैं । एक कारणसे भी अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं, इसलिए प्रदोषादिकके एक समान रहते हुए भी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंका आस्रव सिद्ध होता है। अथवा विषयके भेदसे आस्रवमे भेद होता है। ज्ञानसम्बन्धी प्रदोषादिक ज्ञानावरणके आस्रव हैं और दर्शनसम्बन्धी प्रदोषादिक दर्शनावरणके आस्रव हैं। 8629. जिस प्रकार इन दोनों कर्मोंका आस्रव अनेक प्रकारका है उसी प्रकार अपनेमें, दूसरेमें या दोनोंमें विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये असाता वेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥1॥ 8630. पीड़ारूप आत्माका परिणाम दुःख है । उपकार करनेवालेका सम्बन्ध टूट जानेपर जो विकलता होती है वह शोक है । अपवाद आदिके निमित्तसे मनके खिन्न होनेपर जो तीव्र अनुशय-संताप होता है वह ताप है । परितापके कारण जो आँसू गिरनेके साथ विलाप आदि 1. -लम्बनं स्वपरा- आ., दि. 1, दि. 2। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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