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________________ --41268 493] चतुर्थोऽध्यायः [193 8491. क्व इमे सारस्वतादयः ? अष्टास्वपि पूर्वोत्तरादिषु दिक्षु यथाक्रममेते सारस्वतादयो देवगणा वेदितव्याः । तद्यथा---पूर्वोत्तरकोणे सारस्वतविमानम्, पूर्वस्यां विशि आदित्यविमानम्, पूर्वदक्षिणस्यां दिशि वह्निविमानम्, दक्षिणस्यां दिशि अरुणविमानम्, दक्षिणापरकोणे गर्दतोयविमानम्, अपरस्यां विशि तुषितविमानम्, उत्तरापरस्यां दिशि अव्याबाधविमानम्, उत्तरस्यां दिशि अरिष्टविमानम् । 'च'शब्दसमुच्चितास्तेषामन्तरेषु द्वौ देवगणौ । तद्यथा-सारस्वतादित्यान्तरे अग्न्याभसूर्याभाः। आदित्यस्य च वह्नश्चान्तरे चन्द्राभसत्याभाः। वह्नयरुणान्तराले श्रेयस्करक्षेमंकराः । अरुणगर्दतोयान्तराले वृषभेष्टकामचाराः गर्दतोयतुषितमध्ये निर्माणरजोदि. गन्तरक्षिताः । तुषिताव्याबाधमध्ये आत्मरक्षितसर्वरक्षिताः। अव्याबाधारिष्टान्तराले मरुद्वसवः । अरिष्टसारस्वतान्तराले अश्वविश्वाः । सर्वे एते स्वतन्त्राः; होनाधिकत्वाभावात्, विषयरतिविरहादेवर्षयः, इतरेषां देवानामर्चनीयाः, चतुर्दशपूर्वधराः तीर्थकरनिष्क्रमणप्रतिबोधनपरा वेदितव्याः। 8492. आह, उक्ता लौकान्तिकास्ततश्च्युता एक गर्भवासमवाप्य निर्वास्यन्तीत्युक्ताः। किमेवमन्येष्वपि निर्वाणप्राप्तिकालविभागो विद्यते । इत्यत आह विजयादिषु द्विचरमाः ॥26॥ 8493. 'आदि'शब्दः प्रकारार्थे वर्तते, तेन विजयवंजयन्तजयन्तापराजितानुविशविमानानामिष्टानां ग्रहणं सिद्धं भवति । कः पुनरत्र प्रकारः ? अहमिन्द्रत्वे सति सम्यग्दृष्टय पपादः । सर्वार्थसिद्धिप्रसङ्ग इति चेत् । न तेषां परमोत्कृष्टत्वात्, अन्वर्थसंज्ञात एकचरमत्वसिद्धः। चरमत्वं 8491. शंका ये सारस्वत आदिक कहाँ रहते हैं ? समाधान–पूर्व-उत्तर आदि आठों ही दिशाओं में क्रमसे ये सारस्वत आदि देवगण रहते हैं ऐसा जानना चाहिए। यथा-पूर्वोत्तर कोणमें सारस्वतोंके विमान हैं । पूर्व दिशामें आदित्योंके विमान हैं। पूर्व-दक्षिण दिशामें वह्निदेवोंके विमान हैं। दक्षिण दिशामें अरुण विमान हैं। दक्षिण-पश्चिम कोने में गर्दतोयदेवोंके विमान हैं । पश्चिम दिशामें तुषितविमान हैं। उत्तर-पश्चिम दिशामें अव्याबाधदेवोंके विमान हैं। और उत्तर दिशामें अरिष्टदेवोंके विमान हैं। सूत्रमें 'च' शब्द है उससे इनके मध्य में दो दो देवगण और हैं इसका समुच्चय होता है। यथा-सारस्वत और आदित्यके मध्य में अग्न्याभ और सूर्याभ हैं। आदित्य और वह्निके मध्यमें चन्द्राभ और सत्याभ हैं। वह्नि और अरुणके मध्य में श्रेयस्कर और क्षेमंकर हैं। अरुण और गर्दतोयके मध्य में वृषभेष्ट और कामचौर हैं। गर्दतोय और तुषितके मध्यमें निर्माणरजस् और दिगन्तरक्षित हैं । तुषित और अव्याबाधके मध्यमें आत्मरक्षित और सर्वरक्षित हैं । अव्याबाध और अरिष्टके मध्य में मरुत् और वसु हैं । अरिष्ट और सारस्वतके मध्यमें अश्व और विश्व हैं। ये सब देव स्वतन्त्र हैं क्योंकि इनमें हीनाधिकता नहीं पायी जाती। विषय-रतिसे रहित होनेके कारण देवऋषि हैं। दूसरे देव इनकी अर्चा करते हैं। चौदह पूर्वोके ज्ञाता हैं और वैराग्य कल्याणकके समय को संबोधन करनेमें तत्पर हैं। 8492. लौकान्तिक देवोंका कथन किया और वहाँसे च्युत होकर तथा एक गभको धारण करके निर्वाणको प्राप्त होंगे यह भी कहा । क्या इसी प्रकार अन्य देवोंमें भी निर्वाणको प्राप्त होनेके कालमें भेद है ? अब इसी बातका ज्ञान कराने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं विजयाविकमें दो चरमवाले देव होते हैं ॥26॥ 8493. यहाँ आदि शब्द प्रकारवाची है। इससे विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और नौ अनुदिगोंका ग्रहण सिद्ध हो जाता है । शंका-यहाँ कौन-सा प्रकार लिया है ? समाधानअहमिन्द्र होते हुए सम्यग्दृष्टियोंका उत्पन्न होना, यह प्रकार यहाँ लिया गया है। शंका-इससे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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