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________________ 178] सर्वार्थसिद्धौ [413 8445 8445. 'आदित' इत्युच्यते', अन्ते मध्ये अन्यथा वा ग्रहणं मा विज्ञायोति। आदौ आदितः । द्वयोरेकस्य च निवृत्त्यर्थ 'त्रि'ग्रहणं क्रियते । अथ चतुण्णां निवृत्त्यर्थं कस्मान्न भवति ? 'आदितः' इति वचनात् । षड्लेश्या उक्ताः । तत्र चतसृणां लेश्यानां ग्रहणार्थं 'पोतान्त' ग्रहणं कियते । पीतं तेज इत्यर्थः । पीता अन्ते यासां ताः पीतान्ताः । पीतान्ता लेश्या येषां ते पीतान्तलेश्याः। एतदुक्तं भवति--आदित्तस्त्रिषु निकायेषु भवनवासिव्यन्तरज्योति एकनामसु देवानां कृष्णा नीला कापोता पीतेति चतस्रो लेश्या भवन्ति। 8446. तेषां निकायानामन्तर्विकल्पप्रतिपादनार्थमाह____दशाष्टपंचद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ॥3॥ 8447. चतुण्णा देवनिकायानां दशादिभिः संख्याशब्दैर्यथासंख्यमभिसंबन्धो वेदितव्यः । वशविकल्पा भवनवासिनः । अष्टविकल्पा व्यन्तराः । पञ्चविकल्पा ज्योतिष्काः। द्वादशविकल्पा वैमानिका इति । सर्ववैमानिकानां द्वादशविकल्पान्तःपातित्वे प्रसक्ते ग्रैवेयकादिनिवृत्त्यर्थं विशेषणमुपादीयते 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' इति । अथ कथं कल्पसंज्ञा? इन्द्रादयः प्रकारा दश एतेषु कल्प्यन्त 8445. अन्तके तीन निकायोंका, मध्यके निकायोंका या विपरीत क्रमसे निकायोंका ग्रहण न समझ लिया जाय, इसलिए सूत्र में 'आदितः' पद दिया है। दो और एक निकायके निराकरण करनेके लिए 'त्रि' पदका ग्रहण किया है। शंका--'त्रि' पदसे चारकी निवत्ति क्यों नहीं होती है? समाधान-सूत्रमें जो 'आदित:' पद दिया है इससे ज्ञात होता है कि त्रि' पद चारकी निवृत्तिके लिए नहीं है । लेश्याएँ छह कहीं है। उनमें से चार लेश्याओंके ग्रहण करनेके लिए सूवमें 'पीतान्त' पदका ग्रहण किया है। यहाँ पीतसे तेज लेश्या लेनी चाहिए। यहाँ पहले पीत और अन्त इन शब्दोंमें और अनन्तर पीतान्त और लेश्या शब्दोंमें बहुव्रीहि समास है। इसका यह अभिप्राय है कि आदिके भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषो इन तीन निकायोंमें देवोंके कृष्ण, नील, कापोत और पीत ये चार लेश्याएँ होती हैं। विशेषार्थ-यों तो भवनवासी, व्यस्तर और ज्योतिषी-देवोंके एक पीत लेश्या ही होती है किन्तु ऐसा नियम है कि कृष्ण, नील और कापोत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए कर्मभूमियाँ मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच और पीत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए भोगभूमियाँ मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच भवनत्रिकमें उत्पन्न होते हैं । यतः ऐसे कर्मभूमियाँ मनुष्य और तिर्यंचीके मरते समय प्रारम्भकी तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं अतः इनके मरकर भवनत्रिकोंमें उत्पन्त होनेपर वहाँ भी अपर्याप्त अवस्थामें ये तीन अशुभ लेश्याएँ पायी जाती हैं। इसीसे इनके पीत तक चार लेश्याएँ कही हैं । अभिप्राय यह है कि भवनत्रिकोंके अपर्याप्त अवस्थामें पीत तक चार लेश्याएँ और पर्याप्त अवस्था में एक पीत लेश्या होती है। 8 446. अब इन निकायोंके भीतरी भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं- : वे कल्पोपपन्न देव तकके चार निकायके देव क्रमसे दस, आठ, पाँच और बारह भेदवाले हैं ॥3॥ 3447. देव निकाय चार हैं और दश आदि संख्या शब्द चार हैं अत: इनका क्रमसे न्ध जानना चाहिए। यथा--भवनवासी दस प्रकारके हैं, व्यन्तर आठ प्रकारके हैं, ज्योतिषी . प्रकारके हैं और वैमानिक बारह प्रकारके हैं। पूर्वोक्त कथनसे सब वैमानिक बारह भेदामें आ जाते हैं, अत: ग्रेवेयक आदिके निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' 1. --लयते अन्यथा वा ग्रह- वि. 2। -च्यते अन्ते मध्ये वा ग्रह- मु., ता., ना.। --च्यते अन्ते अन्यथा वा ग्रह । 2. ---ताः पीतान्ता लेश्या मु., दि. 2। 3. ज्योतिष्काणां देवा- आ., दि. 1; दि. 2। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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