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________________ सर्वार्थसिद्धौ [1118484. कि तहि ? तत् त्रितयं समुदितमित्याह सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥1॥ $5. सम्यगित्यव्युत्पन्नः शब्दो व्युत्पन्नो वा । अञ्चतेः क्वौ समञ्चतीति सम्यगिति। अस्यार्थः प्रशंसा । स प्रत्येक परिसमाप्यते । सम्यग्दर्शनं सम्यग्ज्ञानं सम्यक्चारित्रमिति। एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देक्ष्यामः । उद्देशमात्रं त्विदमुच्यते-पदार्थानां पाथात्म्यप्रतिपत्तिविषयश्रद्धानसंग्रहार्थ दर्शनस्य सम्यग्विशेषणम् । येन येन प्रकारेण जीवातयः पदार्था व्यवस्थिनास्तेन तेनावगमः सम्यग्ज्ञानम् । विमोहसंशयविपर्ययनिवृत्त्यर्थं सम्यविशेषणम् । संसारकारणनिवृत्ति प्रत्यागूर्णस्य ज्ञानवतः 'कर्मादाननिमित्तक्रियोपरमः सम्यक्चारित्रम् । अज्ञानपूर्वकाचरणनिवृत्त्यर्थं सम्यग्विशेषणम् । 6. पश्यति वृश्यतेऽनेन दृष्टिमात्रं वा दर्शनम् । जानाति 'ज्ञायतेऽनेन ज्ञप्तिमात्रं वा इस प्रकार थोडेमें मोक्ष तत्त्वकी मीमांसा करके आचार्यने अन्तमें उसके कारण तत्त्वकी मीमांसा की है। इस सिलसिलेमें केवल इतना ही लिखना है कि अधिकतर विविध मत वाले लोग ज्ञान, दर्शन और चारित्र इनमें से एक-एकके द्वारा ही मोक्षकी सिद्धि मानते हैं। क्या सांख्य, क्या बौद्ध और क्या वैशेषिक इन सबने तत्त्वज्ञान या विद्याको ही मुक्तिका मुख्य साधन माना है। भक्तिमार्ग या नामस्मरण यह श्रद्धाका प्रकारान्तर है । एक ऐसा भी प्रबल दल है जो केवल नामस्मरणको ही संसारसे तरनेका प्रधान साधन मानता है। यह दल इधर बहत अधिक जोर पकडता जा रहा है । अपने इष्ट का कीर्तन करना इसका प्रकारान्तर है। किन्तु जिस प्रकार रोगका निवारण केवल दवाईके दर्शन आदि एक-एक कारणसे नहीं हो सकता, उसी प्रकार मोक्षकी प्राप्ति भी एक-एकके द्वारा नहीं हो सकती। तो फिर मोक्षकी प्राप्तिका उपाय क्या है ? यह प्रश्न शेष रहता है। इसी प्रश्नका उत्तर देनेके लिए आचार्यने प्रथम सूत्र रचा है। वे कहते हैं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्षका मार्ग है॥1॥ 85. 'सम्यक्' शब्द अव्युत्पन्न अर्थात् रौढिक और व्युत्पन्न अर्थात् व्याकरणसिद्ध है। जब यह व्याकरणसे सिद्ध किया जाता है तब सम् उपसर्ग पूर्वक अञ्च् धातुसे क्विप् प्रत्यय करने पर 'सम्यक्' शब्द बनता है । संस्कृतमें इसकी व्युत्पत्ति 'समञ्चति इति सम्यक्' इस प्रकार होती है। प्रकृत में इसका अर्थ प्रशंसा है। इसे दर्शन, ज्ञान और चारित्र इनमें से प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र । लक्षण और भेदके साथ इनका स्वरूप विस्तारसे आगे कहेंगे। नाममात्र यहाँ कहते हैं—पदार्थोंके यथार्थ ज्ञानमूलक श्रद्धानका संग्रह करनेके लिए दर्शनके पहले सम्यक् विशेषण दिया है। जिस जिस प्रकारसे जीवादिक पदार्थ अवस्थित हैं उस उस प्रकारसे उनका जानना सम्यग्ज्ञान है । ज्ञानके पहले सम्यक् विशेषण विमोह (अनध्यवसाय), संशय और विपर्यय ज्ञानोंका निराकरण करनेके लिए दिया है। जो ज्ञानी पुरुष संसारके कारणोंको दूर करनेके लिए उद्यत है उसके कर्मोंके ग्रहण करने में निमित्तभूत क्रियाके उपरम होनेको सम्यक्चारित्र कहते हैं । चारित्रके पहले 'सम्यक्' विशेषण अज्ञानपूर्वक आचरणके निराकरण करने के लिए दिया है। 1. -गिति। कोऽस्या- दि. 1। 2. -च्यते । पदार्थानां याथा. मु. 3. ज्ञानम्। अनध्यवसाय सं.मु.। 4. -दानमिति तत्कियो- दि, 2। 5. -षणम् । स्वयं पश्य- मु.। -षणम् । यस्मादिति पश्यदि, 1. दि.2। 6. -श्यतेऽनेनेति दृष्टि- मु.। 7. ज्ञाप्तिमात्र मु.। ज्ञानमात्र दि. 21 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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