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________________ चउरासीइमो संधि विससेणे समत्तए करिवर-कर कइंद-धय। कण्णज्जुण भिडिय परोप्परु णाई णिरंकुस मत्त गय ।। [१] मंदर-सिहर-समप्पह-संदण भिडिय पयंग-पुरंदर-णंदण कालवट्ट-गंडीव-धणुधर पढम-चउत्थ-पत्थ रणे दुद्धर पंडुर-पंडरीय सिय-चामर पक्खवाय-वे-भाय-कियायर विज्जु-पुंज-घण-पुंज-समप्पहं सुरवर-सुंदर अजय महप्पहं कास-कुसुम-संकास तुरंगम +++++++++++++ रहवर-चक्क-घोर-चूरिय-फणि मउड-मउहोहामिय-दियमणि तोसिय दससयंसु-सक्कंदण। धीरिय-धायरट्ठ-तवणंदण तूरइं अप्फालियइं पगामई दुंदुहि-गोमुह-डंवर-णामइं घत्ता ओयइं अवरइ-मि रणंगणे देवावियई पभूयाई। जल-थल-णहयल वंभंड णइं णं सयखंडीहूयाई॥ [२] गोवद्ध-गोहंगुली-ताण-हत्थेहिं आभिट्टमाणेहिं राहेय-पत्थेहिं पच्छाइयं अंवरं वाण-लखेहिं साणा-सिअग्गेहिं सोवण्ण-पुंखेहिं णाराय-णालीय-वाराह-कण्णेहिं ___अण्णण्णवेहिं अण्णण्ण-वण्णेहिं वे-भाय जायं जयं पक्ख-वाणेहिं +++++++++++++++ सव्वेहिं वेयड्ढ-सेणी-णिवासेहिं सव्वंसहा-सिंधु-सेलंवरासेहिं कण्णाविदंगोहिं उब्भिट्ट तखेहिं वेयाल-भूयग्गही-जक्ख-रक्खेहिं दुद्दाणवाइच्च-आइच्च-भिच्चेहिं कालि-महकालि-दुग्गा-दइच्चेहिं ४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001429
Book TitleRitthnemichariyam Part 3 2
Original Sutra AuthorSwayambhudev
AuthorRamnish Tomar, Dalsukh Malvania, H C Bhayani
PublisherPrakrit Text Society Ahmedabad
Publication Year1997
Total Pages282
LanguagePrakrit, Apabhransh
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size11 MB
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