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________________ गा० २२] पदेसविहत्तीए द्विदियचूलियाए सामित्तं ४३१ जोगी, अण्णहा अंतोकोडाकोडीमेत्तहिदिसतकम्मस्स वेछावहिसागरोवमाणमुवरि वि संभवेण जहण्णभावाणुववत्तीदो। एइंदियजहण्णहिदिसंतकम्मेणेवे त्ति णावहारणमेत्थ कायव्वं, किंतु तत्तो समयुत्तरादिकमेण सादिरेयवेछावहिसागरोवममेत्तहिदिसंतकम्मे त्ति ताव एदेसि पि हिदिविवप्पाणमेत्य गहणे विरोहो पत्थि, वेछावहिसागरोवमाणि गालिय उवरि सामित्तविहाणादो। तदो उपलक्रवणमेत्तमेदं ति घेत्तव्वं । ७०७. एवं विहेण हिदिसंतकम्मेण तसेसु आगदो । अंतोमुहुत्तेण सम्मत्तं पडिवण्णो एवं भणिदे असण्णिपंचिंदियपज्जत्तएसु जहण्णाउएसुववज्जिय सव्वलहुं पज्जत्तीओ समाणिय अंतोमुहुत्तेण देवाउअं बंधिय कमेण कालं कादूण देवेसुववज्जिय सव्वलह सव्वाहि पज्जत्तीहि पजत्तयदो होदण विस्संतो विसोहिमापरिय सम्मत्तं पडिवण्णो त्ति भणिदं होइ । ण च सम्मत्तुप्पायणमेदं णिरत्थयं, सम्मत्तगुणपाहम्मेण मिच्छत्तस्स बंधवोच्छेदं कादर्णतोमुहुत्तमेत्तसमयपबद्धाणं गालणेण फलोवलंभादो। एदस्सेव अत्थविसेसस्स पदसण वेछावहिसागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालिणे त्ति भणिदं । एवं वेछावहिसागरोवमाणि समयाविरोहेण सम्मत्तमणुपालिय तदवसाणे मिच्छत्तं गदो, अण्णहा पयदसामित्तविहाणोवायाभावादो । एवं मिच्छत्तं umrawr एकेन्द्रियके योग्य स्थितिसत्कर्म ही प्रकृतमें उपयोगी है, अन्यथा अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण स्थितिसत्कर्मका दो छयासठ सागरके ऊपर भी सम्भव होनेसे जघन्यपना नहीं बन सकता है। एकेन्द्रियके योग्य जघन्य स्थितिसत्कर्मके साथ ही जो त्रसोंमें उत्पन्न हुआ है ऐसा यहाँ अवधारण नहीं करना चाहिये। किन्तु एकेन्द्रियके योग्य जघन्य स्थितिसत्कर्मसे लेकर उत्तरोत्तर एक एक समय बढ़ाते हुए साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण स्थितिसत्कर्म तकके इन सब स्थितिविकल्पोंका भी यहाँपर ग्रहण करनेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि दो छयासठ सागर कालके चले जानेके बाद तदनन्तर स्वामित्वका विधान किया गया है, इसलिये 'एइंदियजहण्णट्ठिदिसंतकम्मेण' यह पद उक्त कथनका उपलक्षणमात्र है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिये। ६७०७. इसके आगे सत्रमें 'इस प्रकारके स्थितिसत्कर्म के साथ त्रसोंमें उत्पन्न होकर अन्तमुहूर्तमें सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ' जो ऐसा कहा है सो इसका यह तात्पर्य है कि जघन्य आयुके साथ असंज्ञी पंचेन्द्रियोंमें उत्पन्न हुआ। फिर अतिशीघ्र पर्याप्तियोंको पूरा करके अन्तर्मुहूर्तमें देवायुका बन्ध किया और क्रमसे मरकर देवोंमें उत्पन्न हुआ। फिर अतिशीघ्र सब पर्याप्तियोंको पूरा किया। फिर विश्रामके बाद विशुद्धिको प्राप्त करके सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ। यदि कहा जाय कि इस प्रकार सम्यक्त्वको उत्पन्न कराना निरर्थक है सो यह बात भी नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व गुणकी प्रधानतासे मिथ्यात्वकी बन्धव्युच्छित्ति करके मिथ्यात्वके अन्तर्मुहूर्तप्रमाण समयप्रबद्धोंको गलाने रूप फल पाया जाता है। इस प्रकार इसी अर्यविशेषको दिखलानेके लिये सत्रमें वे छावहिसागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालियूण' यह कहा है। इस प्रकार दो छयासठ सागर काल तक यथाविधि सम्यक्त्वका पालन करके उसके अन्तमें मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। यदि इस जीबको अन्तमें मिथ्यात्वमें न ले जाय तो प्रकृत स्वामित्वके विधान करनेका और कोई उपाय नहीं है, इसीसे इसे अन्तमें मिथ्यात्वमें ले गये हैं। इस प्रकार मिथ्यात्वको प्राप्त हुए इस जीवके Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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