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________________ महाबंधे पदेसंबंधाहियारे ४७. वचि ० - असच्च० वचि० पंचणाणावरणादिपदमदंडओ मणजोगिभंगो । वरि तेजा ० क० सह तेण जहण्णं खँत्तभंगो । अजह० अट्ठ० सव्वलो० । विदियदंडओ मणजोगिभंगो । जह० खैत्तभंगो । अजह० अट्ठ-बारह ० | तदियदंडओ चउत्थदंडओ मणजोगिभंगो । जह० खैत्तभंगो । अजह० अट्ठचों । [ पंचम - छट्टदंडओ मणजोगिभंगो] । उज्जो ० - बादर - जस० जह० खैत्तभंगो । अजह० अट्ठ-तेरह० । सुहुमअपज्ज० - साधार० जह० खत्तभंगो । अजह० लोगस्स असंखै० सव्वलो० । तित्थ० ५४ भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध देवों में और नारकियोंमें मारणान्तिक समुद्धात के समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन त्रसनालीका कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण कहा है । तैजसशरीर और कार्मण शरीरका जघन्य प्रदेशबन्ध अप्रमत्तसंयत जीव करते हैं, इसलिए इनके जघन्य पदकी अपेक्षा स्पर्शन क्षेत्रके समान कहा है । तथा स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान और एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्धातके समय भी इनका बन्ध सम्भव है, इसलिए इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भाग, त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण कहा है। देवोंके विहारवत्स्वस्थानके समय उद्योत आदिका जघन्य प्रदेशबन्ध सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध देवोंमें विहारवत्स्वस्थानके समय और नारकियोंमें व एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्घातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण स्पर्शन कहा है। सूक्ष्म आदिका जघन्य प्रदेशबन्ध आयुबन्धके समय सम्भव है, इसलिए ऐसे जीवों का स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होनेसे वह क्षेत्रके समान कहा है । तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध स्वस्थानके समान एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक समुद्वातके समय भी सम्भव है, इसलिए इनका इस पदकी अपेक्षा स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण और सर्व लोकप्रमाण कहा है। ४७. वचनयोगी और असत्यमृषावचनयोगी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरण आदि प्रथम दण्डकका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है । इतनी विशेषता है कि प्रथम दण्डकको तैजसशरीर और कार्मणशरीरके साथ कहना चाहिए, इसलिए इनका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है। तथा इनका अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । द्वितीय दण्डक भी मनोयोगी जीवोंके समान लेना चाहिए । किन्तु इनका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । तृतीय दण्ड और चतुर्थदण्डकका भङ्ग मनोयोगी जीवोंके समान है। मात्र जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका भङ्ग क्षेत्रके समान है। तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने सनालीका कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । पश्चम दण्डक और षष्ठ दण्डक मनोयोगी जीवोंके समान है । उद्योत, बादर और यशः कीर्तिका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका भङ्ग क्षेत्रके समान है । तथा अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंने त्रसनालीका कुछ कम आठ और कुछ कम तेरह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणका जघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका स्पर्शन क्षेत्रके समान है । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001394
Book TitleMahabandho Part 7
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages394
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size9 MB
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