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________________ ५२८ सिरिभुयणसुंदरीकहा ॥ वीरो जंपइ ‘जइ एवं पुज्जउ तुह कोउयं महाराय ! | पयडसु नियविन्नाणं अब्भसियं जं पुरा किं पि' ||५७८५।। तो अन्नोन्नं दोन्नि वि अभिट्टा वीरसेण-नरसीहा ।। बहुरोसरत्तनयणा पयभरनिद्दलियमहिवीढा ॥५७८६।। बहुबंधकरणकत्तरि-ढोक्कर-तलहत्थमाइकिरियाहिं । तह जुझंति सरोसा तसंति जह नहयरा गयणे ।।५७८७।। जइ बंधइ वीरवई दक्खसरूवो हढेण नरसीहं । ता सो वि तहा छोडइ जह रंजइ वीरसेणो वि ।।५७८८।। एवं ताणन्नोन्नं नियनियविन्नाणपयडणपराण । वीरेण खणद्धेणं पत्तो सीसंमि नरसीहो ।।५७८९।। धरिऊण कंठदेसे एक्केण करेण रायनरसीहं । पुण लेइ धडफडतं बीएण य जोइनाहं पि ॥५७९०॥ एकत्थ मेलिऊणं दोहिं वि हत्थेहिं वीरसेणेण । गयणे भमाडिया ते चामुंडं तज्जयंतेण ।।५७९१।। 'एए मारिज्जंते चामुंडे ! किं न रक्खसि असरणे ?' | पच्चारिऊण एवं पक्खित्ता राय-जोइंदा ॥५७९२॥ कयपरियणहाहारवअसमंजसिहूयसयलपुरिलोयं । तह कत्थ वि ते खित्ता विन्नाया जह न केणाऽवि ||५७९३।। ते घेल्लिऊण दूरं ढुक्को कच्चायणीए जा वीरो । भयमुक्ककिलिगिलिरवा ता सा नट्ठा नहपहेण ॥५७९४॥ तो नटुं दठूणं चामुंडं वलइ वीरसेणो वि । आसासइ नीसेसं नरसीहनरिंदपरिवारं ॥५७९५।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001382
Book TitleSiribhuyansundarikaha
Original Sutra AuthorSinhsuri
AuthorShilchandrasuri
PublisherPrakrit Text Society Ahmedabad
Publication Year2000
Total Pages838
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size10 MB
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