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________________ ७२ कल्याण-मन्दिर स्तोत्र हे प्रभो ! चिन्तामणि-रत्न और कल्प-वृक्ष से भी अधिक महिमाशाली सम्यक्त्व-श्रद्धा प्राप्त हो जाने पर साधकों को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। वे बड़े आनन्द के साथ बिना किसी भी तरह की विघ्न-बाधा के अजर-अमर मोक्ष-धाम को प्राप्त कर लेते हैं। [ ५ ] इअ संथुओ महायस! __ भत्तिब्भर-निब्भरेण हियएण । ता देव ! दिज्ज बोहि भवे-भवे पास जिणचंद ॥ हे महायशस्वी श्री पार्श्वनाथ जिनचन्द्र ! इस प्रकार भक्ति-भावना से भरपूर भक्त-हृदय के द्वारा मैंने आपकी यह स्तुति की है। अतएव जब तक मोक्ष प्राप्त न हो, तब तक भव-भव में मुझे बोधि अर्थात् सम्यक्त्व प्रदान करना। टिप्पणी यह उपसर्गहर-स्तोत्र आचार्य भद्रबाहु स्वामी की अमर कृति है। जैन स्तोत्र-साहित्य के सुप्रसिद्ध नव-स्मरण में इसका दूसरा स्थान है। प्रथम स्मरण नवकार मन्त्र है, तो दूसरा उपसर्गहरस्तोत्र । पाठक इस पर से विचार कर सकते हैं कि उपसर्गहर स्तोत्र का जैन साहित्य में कितना अधिक महत्वपूर्ण स्थान है ! Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001381
Book TitleKalyan Mandir
Original Sutra AuthorSiddhasen Divakarsuri
AuthorAmarmuni
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1980
Total Pages101
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, Stotra, P000, & P010
File Size3 MB
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