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________________ ७१२ गो० कर्मकाण्डे मिथ्या दृष्टिजीवं सासादन- प्रमत्तनुमागि एकविंशतिप्रकृतिस्थानमुमं द्विप्रकार नवप्रकृतिस्थानमुमं कट्टनेकें दोडे-सासणपमतवज्ज अपमत्तं तं समल्लियइ मिच्छो एंबी नियममुंटप्पुदरिदं । सासादननोळं मिश्रनोळं शून्यमक्कु । द्विप्रकार सनदशप्रकृतिस्थानमनसंयतं कटुत्तमि? देशसंयतनागि द्विप्रकार त्रयोदशप्रकृतिस्थानमं कट्टिदोडल्पतरबंधभेदंगळ नाल्कप्पुवु ४ । मत्तमा ५ असंयतं द्विप्रकारसप्तदशप्रकृतिस्थानमं कटुत्तमिदु अप्रमत्तनागि एकप्रकार नवप्रकृतिस्थानमं कट्टिदोडेरडल्पतरबंधभेदंगळप्पुवु २ । वितसंयतंगल्पतरबंधभेदंगळारप्पुवु । ६। सप्तदशप्रकृति. स्थानबंधकसम्यग्मिथ्यादृष्टि देशसंयतगुणस्थानमुमनप्रमत्तगुणस्थानमुमं साक्षात्पोर्दुवुदिल्लक्रमदिदमसंयतनाद बळिकं पोर्तुगुम बुदु मुंपेन्दंत ज्ञातव्यमक्कु । मिथ्यादृष्टयादिगुणस्थानवत्तिगळु साक्षादिनितिनितु गुणस्थानंगळं पोद्वरे दु मुंद चदुरेक्क दुपण पंच य इत्यादि सूत्रं पेळल्पडुगु१० मप्पुरिदं। मिश्रगुणस्थानवत्ति केळगे मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमनल्लदे सासादनगुणस्थानमं पोर्दुवुदिल्ल। द्विप्रकार त्रयोदश प्रकृतिस्थानमं कटुत्तिर्द देशसंयतनेकप्रकारमप्प नवप्रकृतिस्थानमनप्रमत्तनागि कट्टिदोडेरडल्पतरबंध भेदंगळप्पुवु । २। द्विप्रकार नवप्रकृतिस्थानमं कटुत्तिदै प्रमत्तसंयतनप्रमत्तसंयतनागि एकप्रकार नवप्रकृतिस्थानमं कट्टिदोडेरडेयल्पतरबंधविशेष गळप्पु । २। 'मिल्लि नवप्रकृतिस्थानमं कटुत्तिर्दु प्रमतसंयतनप्रमत्तनागियल्लियु नवप्रकृति१५ स्थानमं कटुगुमंतु कट्टत्तं विरलु अवस्थितबंधविशेषमल्लदल्पतरबंधविशेषमें तक्कु दोडे प्रमत्तसंयतंगरतिद्विकबंधमुंदु । अप्रमत्तनोळु बंधमिल्लप्पुरदं । बहुप्रेकृतिबंधदत्तणिदमल्पतरप्रकृतिबंधमप्रमत्तसंयतनोळु सिद्धमप्पुरिदं । अप्रमतसंयतंगल्पतरबंधविशेषं संभविसदेके दोडप्रमत्तनपूर्वकरणनागियुमल्लियु समानभंगनवप्रकृतिस्थानमं कटुगुमप्पुरिदमल्पतरबंधं शून्यमक्कुं। अपूर्वकरणसंयतनेकप्रकारनवप्रकृतिस्थानमं कटुत्तिदु अनिवृत्तिकरणनागि एकप्रकार २. द्वौ। प्रमत्तद्विधानवकस्य अप्रमत्तकभंगनवकेन द्वौ । कथं समसंख्याबंधेऽल्पतरत्वं ? प्रमत्ते अरतिद्विकबंधच्छेदेनाप्रमत्ते प्रकृतिबंधस्याल्पतरत्वसंभवात् । अप्रमत्तेऽपूर्वकरणसमानभंगनवकबंधाच्छून्यं । अपूर्वकरणे एकधानवक देशसंयतमें तेरहका बन्ध दो प्रकारसे । यहाँसे अप्रमत्तमें जावे तो वहाँ नौका बन्ध, प्रकार एक । अतः दो अल्पतर हुए। प्रमत्तमें नौका बन्ध, दो प्रकार । यहाँसे अप्रमत्तमें जावे तो वहां नौका बन्ध एक २५ प्रकार । अतः दो अल्पतर हुए। शंका-प्रमत्त और अप्रमत्तमें नौका ही बन्ध होता है। अतः समान संख्या होनेसे अवस्थित बन्ध ही सम्भव है । अल्पतर कैसे कहा? समाधान-प्रमत्तमें अरति और शोकके बन्धकी व्युच्छित्ति हुई है। उसकी अपेक्षा अकृतिबन्ध अल्पतर होनेसे अल्पतर बन्ध सम्भव है। अप्रमत्तसे अपूर्वकरणमें जानेपर दोनोंमें समान रूपसे नौका बन्ध होनेसे अल्पतर बन्ध सम्भव नहीं है। अतः शून्य कहा है। १. म विल्ली । २. इदरभिप्रायं मुंपेळ्व प्रमत्ताप्रमत्तनोळु अरिवुदु । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001326
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages828
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Karma
File Size18 MB
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