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________________ कर्णाटवृत्ति जीवतत्त्वप्रदीपिका ९२३ कटुगुं। ८॥ मत्तमप्रमत्तसंयतनाहारयुतत्रिंशत्प्रकृतिस्थानमनेकभंगयुतमं कटुत्तखें तीथंबंधर्म प्रारंभिसि एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थानमनेक भंगयुतमागि कटुगुं। मत्तमुपशमश्रेण्यवतरणदोल अपूर्वकरणनेकभंगयुतकप्रकृतिस्थानमं कटुत्तं देवगतियुतमागियुं देवगतितीर्थयुतमागियुं देवगत्याहारद्वययुतमागियुं देवगत्याहारद्वयतीत्थंयुतमागियु कटुगुमप्पुवरिंदमवु नाल्कु भंगंगळमप्पुवु । ४ ॥ कूडि पंचचत्वारिंशद् भंगंगळप्पुर्वे बुदत्यं ॥ अनंतरं प्रमावरहितरुगळ अल्पतरभंगंगळं पेळ्दपरु :-- इगिविहिगिगिखखतीसे दस णव णवडधियवीसमट्टविहं । देवचउक्केक्केक्कं अपमत्तप्पदरछत्तीसा ॥५७८॥ एकविधे एकेक खखाधिकत्रिंशत्के दशनव नवाष्टाधिकविंशतिरष्टविधा देवचतुष्के एकस्मिन्नेकोप्रमत्ताल्पतर षट्त्रिंशत् ॥ एकैकभंगंगळगुळ्ळ एक एक खखाधिक त्रिंशत्प्रकृतिस्थानंगळोळ वश नव नव अष्टाधिकविशतिप्रकृतिस्थानंगळ प्रत्येकमष्टाष्टभंगयुतंगळप्पुवु । देवचतुष्कदोळोदरोळोंदु भंगमागुत्तं विरलु नाल्कक्कं नाल्कु भंगंगळप्पु ४ वितप्रमत्ताल्पतर षट्त्रिंशद भंगंगळप्पुवु । ३६ ॥ संदृष्टि :देवगत्यष्टधानवविंशतिकं बघ्नन्नप्रमत्तो भूत्वा तोहारकर्यकत्रिंशत्कं बघ्नातीत्यष्टौ । पुनरप्रमत्तः एकघाहारविशत्कं बघ्नस्तीर्थबन्धं प्रारभ्यकत्रिशत्कं बनातीत्येकः । पनरवरोहकापूर्वकरणः एकधक बनन देवगतियतं १५ देवतीर्थयुतं देवगत्याहारकयुतं देवगत्याहारकतीर्थयुतं च बध्नातीति चत्वारः। एवं पंचचत्वारिंशदित्यर्थः ॥५७७।। अथाप्रमत्तादीनामल्पतरभंगानाह एकैक_कै रुखखाषित्रिंशत्केष्वष्टाष्टवादशनवनवाष्टाधिकविंशतिकान्येकैकधादेवचतुष्कं चेत्यप्रमत्ताल्पतराः षत्रिंशत् । तद्यथातो आठ भंग होते हैं। पुनः प्रमत्त देवगति तीर्थसहित उनतीसको आठ भंगोंके साथ बाँध २० अप्रमत्त होकर तीर्थ आहारक सहित इकतीसको एक भंगके साथ बाँधे तो आठ भंग हुए। पुनः अप्रमत्त आहारक सहित तीसको एक भंगके साथ बाँध तीर्थकरके बन्धको प्रारम्भ कर एक भंग सहित इकतीसको बाँधे तो एक भंग हुआ। पुनः उतरता हुआ अपूर्वकरण एक भंग सहित एकको बाँधकर नीचे आकर देवगतियुत अठाईसको या देवगति तीर्थ सहित उनतीस को या देवगति आहारक सहित तीसको या देवगति आहारक तीर्थ सहित इकतीसको एक २५ भंगके साथ बांधनेपर चार भंग होते हैं। इस प्रकार पैंतालीस भुजाकार होते हैं ॥५७७।। आगे अप्रमत्तमें अल्पतर भंग कहते हैं एक एक भंगसहित एक एक शून्य शून्य अधिक तीस प्रकृतिरूप स्थानोंको बाँधकर आठ आठ भंग सहित दस नौ नौ आठ अधिक बीस प्रकृतिरूप स्थान और एक एक भंगके साथ देवगति सहित चार स्थानोंको बाँधनेपर अप्रमत्तमें छत्तीस अल्पतर होते हैं । वही ३० कहते हैं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001326
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages828
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Karma
File Size18 MB
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