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________________ ९०२ गो० कर्मकाण्डे अप्पपरोभयठाणे बंधट्टाणाण जो दु बंधस्स । सट्ठाण परहाणं सव्वपरट्ठाणमिदि सण्णा ॥५५५॥ आत्मपरोभयस्थाने बंधस्थानानां यस्तु बंधस्य । स्वस्थानपरस्थान सर्वपरस्थान मिति संज्ञा ॥ आत्मपरोभयस्थाने मिथ्यादृष्टयसंयताप्रमादरुगळ आत्म स्वस्वगुणस्थानदल्लियुं, पर स्वस्व. ५ गुणस्थानमं त्यजिसि परगुणस्थानदल्लियुं, उभयस्थाने परगति परगुणस्थानदल्लियुमितु त्रिस्थानदोळमा मिथ्यादृष्ट्यसंयताप्रमादरुगळ त्रयोविंशत्यादिबंधस्थानंगळसंबंधि भुजाकाराल्पतरावस्थि. तावक्तव्यरूपमप्प यस्तु बंधस्तस्य आउदोंदु बंधमा बंधक्कक्रमदिदं स्वस्थान भुजाकाराविबंध, परस्थानभुजाकारादिबंधदुं सर्वपरस्थानभुजाकारादिबंध, संजयकुं॥ अनंतरं मिथ्यादृष्टयादि स्वस्वगुणस्थानस्थित जीवंगळगे स्वस्वगुणस्थानच्युतियागुत्तं १. विरले नितं नितु गुणस्थानप्राप्तियक्कुम दोडे पेळ्दपरु : चदुरेक्कदुपण पंच य छत्तिगठाणाणि अप्पमत्ता । तिसु उवसमगे संतेति य तिय तिय दोणि गच्छंति ॥५५६॥ चतुरेकद्वि पंच पंच च षट् त्रिक स्थानान्यप्रमत्तांतानि। त्रिषूपशमकेषु शांते त्रिक त्रिक त्रिक द्वि गच्छंति ॥ मिथ्यादृष्टि जीवं नाल्कु गुणस्थानंगळं पोदुगुं। सासादननो दे गुणस्थानमनेन्दुगुं। मिश्रनरडे गुणस्थानमनेय्दुगुं। असंयतनुं देशसंयतनुमय्दु मम्दु गुणस्थानंगळनेय्दुवर । प्रमत्तनार गुणस्थानंगळनेम्दुगुं। अप्रमत्तं मूलं गुणस्थाननंगळनेप्दुगुं। अपूर्वकरणादि मूवरुमुपशमकरं प्रत्येक मूरुं मूलं गुणस्थानंगळ पोद्गुं । उपशांतकषायनेरडे गुणस्थानंगळं पोदर्दुगुं ॥ आत्मस्थानं स्वगुणस्थानं, परस्थानं परगणस्थानं, उभयस्थान परगतिपरगणस्थानं । अस्मिंस्त्रये यस्त मिथ्यादृष्टयसंयताप्रमत्तबंधस्थानसंबंधी भुजाकारादिबंधः स क्रमेण स्वस्थानभुजाकारादिः परस्थानभुजाकारादिः सर्वपरस्थानभुजाकारादिरितिसंज्ञः स्यात् ॥५५५॥ मिथ्यादृष्टयः स्वस्वगुणस्थानं त्यक्त्वा अप्रमत्तांताः क्रमेण चत्वार्येक द्वे पंच पंच षट् त्रीणि गुण-स्थानानि गच्छंति । अपूर्वकरणादित्र्युपशमकास्त्रीणि त्रीणि, उपशांतकषाया द्वे । ॥५५६॥ स्वस्थान आदिका लक्षण कहते हैं आत्मस्थान अर्थात् विवक्षित अपना गुणस्थान और परस्थान अर्थात् विवक्षित गुणस्थानसे अन्य गणस्थान तथा उभयस्थान अर्थात् अन्यगति और अन्यगुणस्थान, इन तीनोंमें जो मिथ्यादृष्टि, असंयत और अप्रमत्तके बन्धस्थान सम्बन्धी मुजकारादि बन्ध हैं उनकी क्रमसे स्वस्थान मुजकार आदि परस्थान भुजकार आदि और सर्वपरस्थ न मुजकारादि संज्ञा है ।।५५५॥ मिथ्यादृष्टि आदि अपने-अपने गुणस्थानको छोड़कर अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त क्रमसे चार, एक, दो, पाँच, पांच, छह और तीन गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं। अपूर्वकरण आदि तीन उपशमश्रेणिवाले तीन-तीनको और उपशान्त कषायवाले दो गुणस्थानों को प्राप्त होते हैं ॥५५६॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001326
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages828
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Karma
File Size18 MB
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