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________________ ७८० गो० कर्मकाण्डे अनंतरमातपनामकम्ममुद्योतनामकर्ममुं प्रशस्तविशेषप्रकृतिगळप्पुरिदं बंधकालदोळावाव कर्मपदयुतमागि बंधमकुम दोडे पेळ्दपरु : भूबादरपज्जत्तेणादावं बंधजोग्गमुज्जोवं । तेउतिगूणतिरिक्खपसत्थाणं एगदरगेण ॥२४॥ भूबादरपर्याप्तेनातपो बंधयोग्यः उद्योतः। तेजस्त्रिकोनतिर्यक्प्रशस्तानामेकतरेण ॥ भूबादरपर्याप्तेन पृथ्विकायबादरपर्याप्तकम्मपददोडने आतपो बंधयोग्यः आतपनामकर्म बंधयोग्यम। मन्य कर्मपदंगळोळेल्लियं बंधमिल्लेंब नियम मुंटप्पुदरिदं । उद्योतः उद्योतनाम. कर्म तेजस्त्रिकोनतिर्यक्प्रशस्तानामेकतरेण बंधयोग्यः तेजस्कायवायुकायसाधारणवनस्पतिकायं. गळ बादरमुमं सूक्ष्मममनन्य कर्मपदंगळ सूक्ष्मंगळुमप्रशस्तंग ठप्पुदरिंदमउ सहितमागि बिटु १. शेषतिग्यचरुगळ संबंधि बादरपर्याप्ताविप्रशस्तकर्मपदंगळ मध्यदोळेकतर कर्मपददोडने बंष. योग्यमक्कुमदु कारणमागि पृथ्वीकायबावरपर्याप्तकर्मपददोडने आतपनामकर्मयुत षड्विशति प्रकृतिबंधस्थानमुमुद्योतनामकर्मयुत ड्वशतिप्रकृतिबंधास्थानंगळे रडुं संभविसुववु । अप्कायबावरपर्याप्तकर्मपददोडनुद्योतनामकर्मयुतड्विशतिप्रकृतिबंधस्थान, संभविसुवुदु । प्रत्येकवनस्पति कायपर्याप्तकर्मपददोडनेयुमुद्योतनामकर्मयुत षड्विंशतिप्रकृतिबंधस्थानसंभवमकुं। द्वींद्रिय. १५ त्रीद्रियचतुरिद्रिय असंजिपंचेंद्रिय संशिपंचेंद्रिय कर्मबंधपदंगळोडनुयोतयुतत्रिशत्प्रकृतिबंधस्थान संभवमक्कुमितु तिर्यक्प्रशस्तकर्मपदंगळ मध्यदोळे कतरकर्मपददोडने बंधमागुत्तिरछेटु कर्मपदंगळोळुद्योतनामकम्म बंधयोग्यमक्कु ।। पृथ्वीकायबादरपर्याप्तनातपः बंधयोग्यो नान्येन । उद्योतस्तेजोवातसाधारणवनस्पतिसंबंधिबादरसूक्ष्माण्यन्यसंबंधिसूक्ष्माणि च अप्रशस्तत्वात् त्यक्त्वा शेषतिर्यसंबंधिबादरपर्याप्तादिप्रशस्तानामन्यतरेण बंधयोग्यः, २. ततः पृथ्वी कायबादरपर्याप्तेनातपोद्योतान्यतरयुतं, बादराकायपर्याप्तप्रत्येकवनस्पतिपर्याप्तयोरन्यतरेणोद्योतयुतं च षड्विंशतिक, द्वींद्रियत्रींद्रियचरिद्रियासंज्ञिपंचेद्रियासंज्ञिपंचेद्रियकर्मान्यतरेणोद्योतयतं त्रिशत्कं च भवति ॥५२४॥ आतप और उद्योत प्रशस्त प्रकृति होनेसे किस पदके साथ बँधती हैं यह कहते हैं आतप प्रकृति पृथ्वीकाय बादर पर्याप्त के साथ ही बन्धयोग्य है, अन्यके साथ उसका २५ बन्ध नहीं होता। तेजस्काय, वायुकाय और साधारण वनस्पति सम्बन्धी बादर सूक्ष्म तथा अन्य सम्बन्धी सूक्ष्म ये सब अप्रशस्त हैं। अतः इन्हें छोड़कर शेष तिर्यच सम्बन्धी बादर पर्याप्त आदि प्रशस्त प्रकृतियों में से किसी एकके साथ उद्योत प्रकृति बन्धयोग्य है। अत: पृथ्वीकाय बादर पर्याप्त सहित आतप उद्योतमें-से किसी एकके साथ छब्बीस प्रकृतिरूप स्थान होता है। अथवा बादर अप्कायिक पर्याप्त, प्रत्येक वनस्पति पर्याप्त में से किसी एकके १. साथ उद्योत प्रकृति सहित छब्बीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान होता है। दो-इन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय और संज्ञी पंचेन्द्रिय में से किसी एक प्रकृति सहित तथा उद्योत प्रकृति सहित तीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान होता है ॥५२४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001326
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages828
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Karma
File Size18 MB
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