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________________ -२. २७८] बिदुओ महाधियारो रयणप्पहावणीए कोसा चत्तारि ओहिणाणखिदी। तप्परदो पत्तेकं परिहाणी गाउदरेण ।। २७१। को. ४ । ७।३।५।२।३। । । ओहि सम्मत्ता। गुणजीवा पजत्ती पाणा सण्णा य मग्गणा कमसो । उवजोगा कहिदव्वा णारइयाणं जहाजोगं ॥ २७२ चत्तारो गुणठाणा णारयजीवाण होति सव्वाणं । मिच्छाइट्ठी सासणमिस्सो य तहा य अविरदो सम्मो ॥ २७३ ताण यपञ्चक्खाणावरणोदयसहिदसव्वजीवाणं । हिंसाणंदजुदाणं णाणाविहसकिलेसपउराणं॥ २७४ देसविरदादिउवरिमदसगुणठाणाणे हेदुभूदाओ। जामो विसोधियाओ कइया वि ण ताओ जायंति ॥ २७५ पजत्तापजत्ता जीवसमासा य होति एदाणं । पजत्ती छब्भेया तेत्तियमेत्ता अपजत्ती ॥ २७६ पंच वि इंदियपाणा मणवचिकायाणि आउपाणा य । आणप्पाणप्पाणा दस पाणा हॉति चउ सण्णा ॥ २७७ णिरयगदीए सहिदा पंचक्खा तह य हाँति तसकाया । चउमणवचदुगवेगुम्वियकम्मइयसरीरजोगजुदा ॥ २७८ __ रत्नप्रभा पृथिवीमें अवधिज्ञानका क्षेत्र चार कोसमात्र है। इसके आगे प्रत्येक पृथिवीमें उक्त अवधि-क्षेत्रमेंसे अर्ध गव्यूतिकी कमी होती चली गई है ॥ २७१ ॥ र. प्र. को. ४; श. प्र. ५ वा.प्र. ३; पं. प्र.५; धू. प्र. २; त. प्र. ३; म. त. प्र. १ को. इसप्रकार अवधिज्ञानका क्षेत्र समाप्त हुआ। अब इस समय नारकी जीवोंमें यथायोग्य क्रमसे गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, मार्गणा और उपयोग (ज्ञान-दर्शन ), इनका कथन करने योग्य है ॥ २७२ ।। सब नारकी जीवोंके मिथ्यादृष्टि, सासादन, मिश्र और अविरतसम्यग्दृष्टि, ये चार गुण- . स्थान हो सकते हैं ॥ २७३ ।। ___ अप्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे सहित, हिंसामें आनन्द माननेवाले और नानाप्रकारके प्रचुर दुःखोंसे संयुक्त उन सब नारकी जीवोंके देशविरत आदिक उपरितन दश गुणस्थानोंके हेतुभूत, जो विशुद्ध परिणाम हैं, वे कदाचित् भी नहीं होते हैं ॥ २७४-२७५ ॥ ___ इन नारकी जीवोंके पर्याप्त और अपर्याप्त दो जीवसमास तथा छह प्रकार पर्याप्तियां व इतनी ( छह ) ही अपर्याप्तियां भी होती हैं । ॥ २७६ ॥ नारकी जीवोंके पांचों इन्द्रिय प्राण, मन-वचन-काय ये तीनों बलप्राण, आयुप्राण और आनप्राण ( श्वासोछ्वास ) प्राण, ये दशों प्राण तथा आहार, भय, मैथुन और परिग्रह, ये चारों संज्ञायें होती हैं ॥ २७७ ॥ सब नारकी जीव नरकगतिसे सहित; पंचेन्द्रिय; त्रसकायवाले; सत्य, असत्य, उभय और अनुभय, इन चार मनोयोग, चारों वचनयोग, तथा दो वैक्रियिक (वैक्रियिक, वैक्रियिकमिश्र), कार्मण, इन तीन कार्ययोगोंसे संयुक्त; द्रव्य और भावसे नपुंसकवेदेवाले; सम्पूर्ण कषायोंमें आसक्त; मति, श्रुत १द जहाजोगं. २ दब गुणठाणाणि. ३ ब उवसोधियाउ.. TP. 13 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001274
Book TitleTiloy Pannati Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size12 MB
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