SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 94
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५६ हरिवंशपुराणे लक्षाश्चतुर्दशवोक्ताः पञ्चसप्ततिरप्यतः । सहस्राणि स विस्तारस्तस्यारस्यापि सर्वतः ॥२०३॥ लक्षास्त्रयोदश व्यंशस्त्रयस्त्रिंशच्छतत्रयम् । ज्यशीतिश्च सहस्राणि विस्तारस्तारगोचरः ॥२०४॥ लक्षा द्वादश ज्यशौ च षट्षष्टिः षट्शती तथा । सहस्राण्येकनवतिर्विस्तारो मारगोचरः ॥२०५॥ लक्षा द्वादश वर्चस्के लक्षोनास्तनके तु ताः । त्र्यंशश्चाष्टसहस्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतत्रयम् ॥२०६॥ लक्षा दश षडस्योक्ताः सहस्रं षोडशात्मकम् । षटशती च त्रिमागी च षट्षष्टिः स प्रकीर्तितः ॥२०७॥ लक्षा नव सहस्राणि पञ्चविंशतिरेव च । विस्तारो विस्तरेणोकस्तज्ज्ञः खडखडस्य सः ॥२०८।। लक्षास्तमःश्रुतेरष्टौ योजनानां शतत्रयम् । त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि व्रयस्त्रिंशत्त्रयं च सः ॥२०९।। लक्षाः सप्त भ्रमस्यासौ चत्वारिंशत्सहस्रकैः । शतानि षोडशांशी च षटषष्टिरपि माषितः ॥२१०॥ लक्षाः षडेव विस्तारः सपञ्चाशरसहस्रिकाः । योजनानां समन्तात्त झषस्य परिभाषितः ॥२१॥ लक्षाः पञ्चैव चान्ध्रस्य त्रयस्त्रिंशच्छतत्रयम् । व्यंशश्चाप्यष्टपञ्चाशत् सहस्राणि स वर्णितः ॥२१२॥ लक्षाश्चतस्र उद्दिष्टास्तमिस्र व्यंशकद्वयम् । षट्षष्टिश्व सहस्राणि षट्षष्टिः षटशती च सः ॥२.१३॥ लक्षास्तिस्रो हिमस्यापि विस्तारः पञ्चसप्ततिः । सहस्राणि समादिष्टः शुद्धकेवल दृष्टिमिः ॥२१४॥ लक्षद्वयं विमागश्च विस्तारो वर्दलस्य तु । ज्यशीतिश्च सहस्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतत्रयम् ॥२१५॥ लल्लकस्य तु लक्षका षट्षष्टिः षट्शती तथा । सहस्राण्येकनवतिर्विस्तारः त्र्यंशकद्वयम् ॥२१६॥ छियासठ हजार छह सौ छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमें एक भाग प्रमाण है ॥२०२॥ चौथी पृथिवीके आर नामक पहले इन्द्रकका विस्तार सब ओर चौदह लाख पचहत्तर हजार योजन कहा है ॥२०३।। दूसरे तार इन्द्रकका विस्तार तेरह लाख तेरासी हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भागोंमें एक भाग प्रमाण है ॥२०४॥ तीसरे मार नामक इन्द्रकका विस्तार बारह लाख एकानबे हजार छह सौ छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमें दो भाग प्रमाण है ॥२०५।। चौथे वर्चस्क इन्द्रकका विस्तार बारह लाख योजन है। पांचवें तनक इन्द्रकका विस्तार ग्यारह लाख आठ हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भागों में एक भाग प्रमाण है ॥२०६।। छठवें खड इन्द्रकका विस्तार दश लाख सोलह हजार छह सौ छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमें दो भाग है॥२०७॥ और सातवें खडखड नामक इन्द्रकका विस्तार जानकार आचार्योंने नौ लाख पच्चीस हजार योजन कहा है ॥२०८॥ पाँचवों पृथिवीके पहले तम नामक इन्द्रकका विस्तार आठ लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भागोंमें एक भाग प्रमाण है ।।२०९।। दूसरे भ्रम इन्द्रकका विस्तार सात लाख इकतालीस हजार छह सौ छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमें दो भाग है ॥२१०॥ तीसरे झष इन्द्रकका विस्तार छह लाख पचास हजार योजन कहा गया है ॥२११।। चौथे अन्ध्र नामक इन्द्रकका विस्तार पांच लाख अंठावन हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भागोंमें एक भाग प्रमाण वणित है ॥२१२।। और पांचवें तमिस्र नामक इन्द्रकका विस्तार चार लाख छियासठ हजार छह सौ छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागों में दो भाग प्रमाण है ।।२१३।। छठवीं पृथिवीके पहले हिम नामक इन्द्रकका विस्तार निर्मल केवलज्ञानके धारी अरहन्त भगवान्ने तीन लाख पचहत्तर हजार योजन बतलाया है ॥२१४॥ दूसरे वर्दल इन्द्रकका विस्तार दो लाख तेरासी हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भागोंमें एक भाग प्रमाण है ॥२१५।। और तोसर लल्लक इन्द्रकका विस्तार एक लाख एकानबे हजार छह सो छियासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमें दो भाग प्रमाण है ।।२१६।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy