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________________ हरिवंशपुराणे 'क्षेत्रकालादिभिः सिद्धाः साध्या द्वादशभिस्तु ते । अनुयोगैर्यथायोग्यं नयद्वयविवक्षया ||८७ || सिद्धिक्षेत्रे मता सिद्धिरात्मा काशप्रदेशयोः । प्रत्युत्पन्नप्रतिग्राहिनययोगादसंगिनाम् ||८८ || कर्मभूमिषु सर्वासु जन्म प्रति च संहृतिम् । संसिद्धिर्मानुषे क्षेत्रे भूतग्राहिन येक्षया ॥ ८९ ॥ एकस्मिन् समये कालात्प्रत्युत्पन्ननयेक्षया । भूतग्राहिनयेक्षातो जन्मतोऽप्यविशेषतः ||१०|| उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योर्जातः सिद्ध्यति जन्मवान् । विशेषेणावसर्पिण्यां तृतीयान्ततुरीययोः ||११|| दुःषमायां तु संजातो दुःषमायां न सिद्ध्यति । उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योः संहारात्सर्वदा पुनः ॥९२॥ सिद्धिः सिद्धिगतौ ज्ञेया सुमनुष्यगतौ यथा । अवेदत्वेन लिङ्गेन भावतस्तु त्रिवेदतः || ९३|| न द्रव्याव्यतः सिद्धिः पुल्लिङ्गेनैव निश्चिता । निर्ग्रन्थेन च लिङ्गेन सग्रन्थेनाथवा न या ।। ९४|| तीर्थसिद्विद्विधा तीर्थकारीतरविकल्पतः । सति तीर्थकरे सिद्धा असतीतीतरे द्विधा ॥ ९५ ॥ सिद्धिव्यपदेशेन नादेकेन वा पुनः । चतुर्भिः पञ्चभिर्वापि चारित्रैरुपजायते || १६ || ७९२ क्षेत्र, काल आदि बारह अनुयोगोंके द्वारा सिद्धों में भूतपूर्व प्रज्ञापन और प्रत्युत्पन्नग्राही की अपेक्षा भेद सिद्ध करने योग्य हैं || ८७|| क्षेत्रअनुयोगसे जब विचार करते हैं तब प्रत्युत्पन्न - ग्राही नयकी अपेक्षा मुक्त जोदोंकी सिद्धि, सिद्धिक्षेत्र में अथवा आत्मप्रदेशमें अथवा आकाशके प्रदेशों में होती है ||८८ || और भूतग्राही नयकी अपेक्षा जन्मसे पन्द्रह कर्मभूमियों में तथा संहरणसे मनुष्यलोक अर्थात् अढ़ाई द्वीपमें होती है || ८९ || कालअनुयोगसे विचार करनेपर यह जीव प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा एक समय में सिद्ध होता है और भूतग्राही नयकी अपेक्षा जन्मसे सामान्यतया उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीमें उत्पन्न हुआ जीव सिद्ध होता है और विशेष रूपसे अवसर्पिणीको तृतीय कालके अन्त में तथा चतुर्थ कालमें सिद्ध होता है । चतुर्थ कालका उत्पन्न हुआ जीव दुःषमा नामक पंचम काल में सिद्ध हो सकता है परन्तु दुःषमाका उत्पन्न हुआ दुःपमा में सिद्ध नहीं होता । संहरणकी अपेक्षा उत्सर्पिणी अवसर्पिणी के सभी कालोंमें सिद्ध होता है । भावार्थ - जिस समय भरत और ऐरावत क्षेत्रमें प्रथम आदिकाल विद्यमान रहते हैं उस समय यदि कोई व्यन्तरादिदेव किसी विदेहक्षेत्र के मुनिको संहरण कर भरत अथवा ऐरावतक्षेत्रमें छोड़ दे तो उनकी वहाँसे सिद्धि हो सकती है ।। ९०-९२ ।। गतिअनुयोगसे विचार करनेपर सिद्धिगतिमें अथवा मनुष्यगति में सिद्धि होती है। लिगअनुयोगसे विचार करनेपर प्रत्युत्पन्नग्राही नयको अपेक्षा अवेदसे सिद्धि होती है और भूतार्थग्राही नयकी अपेक्षा भाववेदसे तीनों वेदोंमें सिद्धि होती है । द्रव्यवेदst अपेक्षा तीनों वेदोंसे सिद्धि नहीं होती सिर्फ पुरुषवेदसे ही होती है । अथवा लिंगका अर्थ वेष भी हो सकता है इसलिए प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा निर्ग्रन्थ लिंगसे ही सिद्धि होती है और भूतार्थग्राही नयकी अपेक्षा सग्रन्थ लिंगसे होती भी है और नहीं भी होती है ।।९३-९४ ।। तीर्थ अनुयोगसे विचार करनेपर सिद्धि दो प्रकारकी होती है, कोई तीर्थंकर होकर सिद्ध होता है ओर कोई सामान्य केवली होकर सिद्ध होता है । अथवा कोई तीर्थंकर के विद्यमान रहते सिद्ध होता है और कोई तीर्थंकरके मोक्ष चले जानेपर उनके तीर्थ में सिद्ध होता है ||१५|| चारित्रअनुयोगकी अपेक्षा विचार करनेपर प्रत्युत्पन्नग्राही नयकी अपेक्षा एक यथाख्यात चारित्र से ही सिद्धि होती है और भूतार्थग्राही नयकी अपेक्षा चार अथवा पाँच चारित्रोंसे होती है । भावार्थ - यथाख्यातके पहले सामायिक, छेदोपस्थापना और सूक्ष्म १. 'क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्र प्रत्येकबुद्ध बोधितज्ञानावगाहनान्तर संख्यात्पबहुत्वतः साध्याः ' ॥ ९ ॥ त. सू., दशमाध्याय । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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