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________________ त्रिषष्टितमः सर्गः रथोद्धतावृत्तम् स्नेहवानथ जलार्थमाकुलो विष्णुमात्मनि वहन् हलायुधः । वारितोऽप्यशकुनैः पदे पदे दूरमन्तरमितो वनान्तरे ॥ १ ॥ धावतोऽस्य मृगयूथवर्त्मना लोभितस्य मृगतृष्णिकाम्मसा | प्रत्यभात दिशां कदम्बकं प्रोत्तरङ्गसरसीमयं तदा ॥ २ ॥ अभ्यलोकि कलिता कलस्वनैश्चक्रवाककलहंससारसैः । सीरिणाथ सरसी तरङ्गिणी भृङ्गनादितसरोजसंकुला ॥३॥ चेतसास्य सहसा तदीक्षणाद्दीर्घमुच्छ्वसितमङ्गसङ्गिना । मारुतेन शिशिरेण सौहृदं संमुखेन गदितं सुगन्धिना ॥४॥ संपतद्भिरमितः पिपासुभिः श्वापदैः समयमीक्षितस्ततः । आससाद सरसों स सादरो वन्यहस्तिमदवारिवासिताम् ॥ ५ ॥ वारि तीर्थमवगाह्य शीतलं संप्रपाय निरपास्य तृड्व्यथाम् । पद्मपत्रटिका स वारिणा संप्रपूर्य परिवृत्य वाससा ॥ ६ ॥ भदधाव पदधूतधूलि मिर्धूसरीकृतशरीरमूर्धजः । कम्पमानहृदयः स शङ्कया प्रत्यपायबहुले वने हरौ ॥ ७ ॥ अथानन्तर स्नेहसे भरे बलदेव जल प्राप्त करनेके लिए बहुत व्याकुल हुए। वे हृदय में कृष्णको धारण किये हुए आगे बढ़े जाते थे । यद्यपि अपशकुन उन्हें पद-पदपर रोकते थे तथापि वे दूसरे वनमें बहुत दूर जा पहुँचे ॥ १ ॥ जिस मागंसे मृगोंके झुण्ड जाते थे बलदेव उसी मागंसे दौड़ते जाते थे और वे जगह-जगह मृगतृष्णाको जल समझकर लुभा जाते थे । उस समय उन्हें समस्त दिशाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो लहराते हुए तालाबोंसे युक्त ही हों ॥ २ ॥ तदनन्तर बलदेवको एक तालाब दिखा जो मधुर शब्द करनेवाले चक्रवाक, कलहंस और सारस पक्षियोंसे युक्त था, तरंगोंसे व्याप्त था एवं भ्रमर - गुंजित कमलोंसे सहित था || ३ || तालाब के देखते ही बलदेवके हृदयने एक लम्बी सांस ली और उसकी शीतल सुगन्धित वायु सम्मुख आकर इनके शरीरसे लग गयी जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो उसने अपनी मित्रता ही प्रकट की हो ॥ ४ ॥ तदनन्तर चारों ओरसे आनेवाले प्यासे जंगली जानवर जिन्हें भयपूर्ण दृष्टिसे देख रहे थे ऐसे बलदेव जंगली हाथियोंके मदजलसे सुवासित उस सरोवरपर बड़े आदर से जा पहुँचे ॥५॥ उन्होंने घाट में अवगाहन कर शीतल पानी पिया, अपनी प्यासको व्यथा दूर कर और कमलके पत्तीका एक पात्र बनाकर उसे पानीसे भरा तथा कपड़ेसे उसे ढँक लिया ॥ ६ ॥ पानी लेकर वे बड़े वेगसे दौड़े । उस समय पैरोंके आघातसे उड़ी धूलिसे उनके शिरके बाल धूसरित हो गये और 'मैं अनेक विघ्नोंसे भरे वनमें कृष्णको अकेला छोड़ आया हूँ' इस आशंकासे उनका हृदय बार-बार कम्पित हो रहा था ॥ ७ ॥ १. वारितोऽपि शकुनैः म. । ९७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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