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________________ हरिवंशपुराणे जानन्तो वस्तुसद्भावमतोऽभ्युदयनाशयोः । हर्ष भुवि विषादं च न गच्छन्ति मनस्विनः ॥ २६ ॥ भवतोऽपि तपःप्राप्तिस्तन्निमित्तात्तदा भवेत् । भवपद्धतिमीतस्य ब्रह्मलोकोपपादिनः ॥२७॥ द्वैपायनकुमारोऽसौ रोहिण्याः सोदरो यतिः । तदाकर्ण्य वचो जैनं निर्वेदी तपसि स्थितः ॥ २८ ॥ अवधेः पूरणायातः पूर्व देशमुपेत्य सः । तपश्चरितुमारब्धः कषायतनुशोषणम् ॥ २९ ॥ दुःखी जरत्कुमारश्च दुःखितान् भ्रातृबान्धवान् । परिस्यज्य गतः कापि स हरिर्यत्र नेक्ष्यते ॥ ३० ॥ जरत्कुमारे प्रगते वनमेकाकिनि स्थिते । हरिः स्नेहाकुलो मेने शून्यमात्मानमात्मनि ॥३१॥ चचार मृगसामान्यं विजनो विजनं वनम् । हरिप्राणप्रियः प्राणान् प्रियान् हातुमनाः क्वचित् ॥ ३२ ॥ aisपि जनमानस्य यादवा विविशुः पुरीम् । आगामिदुःखसंभारचिन्ता संतप्तमानसाः ॥३३॥ घोषणां कारयांचक्रे चक्री पुरि बलान्वितः । मद्याङ्गानि च मयानि विसृज्यन्तामिति द्रुतम् ॥३४॥ पिष्टकिण्वादिमचाङ्गैस्ततो मयानि मद्यपैः । क्षिप्तानि सशिला कुण्डे' कादम्बगिरिगह्वरे ॥३५॥ कदम्बवनकुण्डेषु 'मुक्ता कादम्बरी तु या । साइमपाकविशेषस्य हेतुत्वेनावतिष्ठते ॥३६॥ तथान्या घोषणादायि कृष्णेन हितबुद्धिना । द्वारिकायां महापुर्यां स्त्रीणां पुंसां च शृण्वताम् ॥३७॥ पिता मे यदि वा माता सुता चान्तःपुराङ्गना । तपस्यन्तु मते जैने वारयामि न तानहम् ॥३८॥ ७५६ बाह्य हेतु जगत् के अभ्युदय तथा क्षयमें कारण होते हैं इसलिए वस्तुके स्वभावको जाननेवाले उत्तम मनुष्य अभ्युदय तथा क्षयके समय पृथिवीपर कभी हर्षं और विषादको प्राप्त नहीं होते ।। २५-२६॥ संसार के मार्ग से भयभीत रहनेवाले आपको भी उसी समय कृष्णकी मृत्युका निमित्त पाकर तपकी प्राप्ति होगी तथा तपकर आप ब्रह्मस्वर्ग में उत्पन्न होंगे ||२७|| द्वैपायनकुमार रोहिणीका भाई - बलदेवका मामा था सो उस समय भगवान् के वचन सुनकर वह संसारसे विरक्त हो मुनि होकर तप करने लगा ||२८|| वह बारह वर्ष की अवधिको पूर्ण करनेके लिए यहांसे पूर्व देशकी ओर चला गया और वहां कषाय तथा शरीरको सुखानेवाला तप करने लगा ||२९|| 'मेरे निमित्तसे कृष्णकी मृत्यु होगी' यह जानकर जरत्कुमार भी बहुत दुःखी हुआ और दुःखसे युक्त भाईबन्धुओंकी छोड़कर वह कही ऐसी जगह चला गया जहाँ कृष्ण दिखाई भी न दें ॥ ३० ॥ जब जरत्कुमार वनमें जाकर अकेला रहने लगा तब स्नेहसे आकुल श्रीकृष्ण ने अपने-आपमें अपनेआपको सूना अनुभव किया ॥ ३१ ॥ जो कृष्णको प्राणोंके समान प्यारा था ऐसा जरत्कुमार कहीं प्रिय प्राणोंको छोड़ने की इच्छासे अकेला ही मृगोंके समान निर्जन वनमें भ्रमण करने लगा ॥३२॥ इधर आगामी दुःखके भारको चिन्तासे जिनके मन सन्तप्त हो रहे थे ऐसे यादव लोग भगवान्को नमस्कार कर नगरीमें प्रविष्ट हुए ||३३|| बलदेवके साथ कृष्णने नगर में यह घोषणा करा दी कि मद्य बनाने के साधन और मद्य शीघ्र ही अलग कर दिये जायें ॥ ३४ ॥ घोषणा सुनते ही मद्यपाय लोगोंने पिष्ट, किण्व आदि मदिरा बनाने के साधनों के साथ-साथ समस्त मदिराको शिलाओं के बीच बने हुए कुण्डसे युक्त कादम्ब गिरिकी गुहा में फेंक दिया ॥ ३५ ॥ कदम्ब वनके कुण्डों में जो मदिरा छोड़ो गयी थी वह अश्मपाक विशेषके कारण उन कुण्डों में भरी रही । भावार्थं - पत्थरको कुण्डियोंमें जिस प्रकार कोई तरल पदार्थ स्थिर रहा आता है उसी प्रकार कदम्ब वनके शिलाकुण्डों में वह मंदिरा स्थिर रही आयी ।। ३६ ।। हितकी इच्छा रखनेवाले कृष्णने समस्त स्त्री-पुरुषोंके सुनते समय द्वारिकापुरीसें दूसरी घोषणा यह टी कि यदि मेरे पिता, माता, पुत्री अथवा अन्तःपुरकी स्त्री आदि कोई भी जिनेन्द्र भगवान्‌के मतमें दीक्षित हो तप करना चाहें तो में उन्हें मना नहीं करता हूँ- उन्हें तप करनेकी मेरी ओरसे १. द्वीपायन - म., ख. । २. हरिः प्राणप्रियः म । ३. सशिलाकुण्डकादम्ब - क. । ४. युक्ता म. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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